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Section 163: पिछली बार आधा साल पाबंदी में रहा अलीगढ़, अब 69 दिन से निषेधाज्ञा जारी

Sat, 11 Apr 2026 11:23 AM IST
Chaman Kumar Sharma अभिषेक शर्मा, अमर उजाला, अलीगढ़

सार

होली, रमजान, परीक्षाएं, स्वतंत्रता दिवस, क्रिसमस मौका कोई भी हो, प्रशासन का पहला कदम निषेधाज्ञा लागू करना ही बन गया है। इससे सवाल उठ रहा है कि क्या हर आयोजन को संभावित खतरे के रूप में ही देखा जा रहा है?
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धारा 163 - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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अलीगढ़ में निषेधाज्ञा अब सिर्फ कानून व्यवस्था का औजार नहीं, बल्कि एक रूटीन प्रशासनिक रिवाज बनती जा रही है। हर बड़े त्योहार, परीक्षा या संवेदनशील मौके से पहले धारा लागू होती है, जो महीनों तक जारी रहती है। पिछले दो वर्षों के आंकड़े बताते हैं कि अलीगढ़ में हर साल करीब पांच-पांच महीने तक निषेधाज्ञा लागू रही। 2025 में तो शहर लगभग आधा साल (पांच महीने) पाबंदियों में रहा। इस साल भी 20 फरवरी से 30 अप्रैल तक यानी 69 दिन से निषेधाज्ञा जारी है। सवाल यह है कि क्या शहर अब भी उतना ही संवेदनशील है या फिर एहतियात अब आदत बन गई है?

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दरअसल निषेधाज्ञा एक कानूनी आदेश है, जिसे जिला प्रशासन (जिलाधिकारी/एसडीएम) कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए लागू करता है। इसका मकसद किसी संभावित हिंसा, दंगा या अशांति को पहले ही रोकना होता है। पहले इसे सीआरपीसी की धारा 144 के तहत लागू किया जाता था, लेकिन अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 163 के तहत लागू किया जाता है। 

सरल भाषा में समझें तो जब प्रशासन को लगता है कि किसी इलाके में स्थिति बिगड़ सकती है, तो वह कुछ समय के लिए पाबंदियां लगा देता है जिसे निषेधाज्ञा कहते हैं। इसके तहत चार–पांच से ज्यादा लोगों के एक जगह इकट्ठा होने पर रोक है। बिना अनुमति धरना, जुलूस, प्रदर्शन पर रोक के अलावा हथियार (लाठी, तलवार, बंदूक आदि) लेकर चलना प्रतिबंधित है। भड़काऊ भाषण या अफवाह फैलाने पर रोक के अलावा जरूरत पड़ने पर इंटरनेट भी बंद किया जा सकता है।

शहर में धार्मिक आयोजनों, त्योहार-पर्व को लेकर कानून व्यवस्था के मद्देनजर निषेधाज्ञा लगाई जाती है। ताकि लोग सजग रहें और कानून के प्रति ध्यान रखें। जिन समयों में स्थितियां सामान्य रहती हैं, उन समयों में इसे हटाया जाता है। इसके सिवाय अन्य कोई मकसद नहीं है।- किंशुक श्रीवास्तव, एडीएम सिटी

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हर मौके पर एक ही जवाब, धारा लागू
होली, रमजान, परीक्षाएं, स्वतंत्रता दिवस, क्रिसमस मौका कोई भी हो, प्रशासन का पहला कदम निषेधाज्ञा लागू करना ही बन गया है। इससे सवाल उठ रहा है कि क्या हर आयोजन को संभावित खतरे के रूप में ही देखा जा रहा है? एक समय था जब हालात के चलते पूरे साल निषेधाज्ञा लागू रहती थी। लेकिन अब जबकि शहर में बड़े सांप्रदायिक तनाव के मामले कम हुए हैं, फिर भी परंपरा नहीं बदली। 2024 और 2025 में करीब पांच-पांच महीने तक पाबंदियां लागू रहीं। 2026 में भी 20 फरवरी से 30 अप्रैल तक 69 दिन की निषेधाज्ञा जारी है।

टारगेटेड एक्शन ज्यादा असरदार: अधिकारी
अलीगढ़ मंडल के अधिकारी मानते हैं कि इंटेलिजेंस आधारित टारगेटेड कार्रवाई, संवेदनशील इलाकों में सीमित पाबंदियां, कम्युनिटी पुलिसिंग और संवाद जैसे विकल्प अपनाकर पूरे शहर को लंबे समय तक प्रतिबंधों में रखने से बचा जा सकता है।

आम जिंदगी पर असर
स्थानीय स्तर पर बड़े सांप्रदायिक तनाव के मामले अब पहले की तुलना में कम सामने आते हैं। सामाजिक और धार्मिक आयोजन भी अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण तरीके से हो रहे हैं। ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि क्या पूरे शहर पर एक समान पाबंदी जरूरी है? निषेधाज्ञा का मतलब भले ही पूर्ण प्रतिबंध नहीं होता, लेकिन इसका असर शहर की रोजमर्रा की गतिविधियों पर साफ दिखता है। उदाहरण के तौर पर छोटे आयोजनों के लिए भी अनुमति जरूरी होना, सामाजिक व छात्र गतिविधियों पर दबाव और हर समय निगरानी का माहौल होना है। कुल मिलाकर अलीगढ़ के हालात बदले हैं, लेकिन निषेधाज्ञा लगाने का तरीका नहीं। अब देखना यह है कि शहर को कब तक एहतियात और आदत के बीच संतुलन का इंतजार करना पड़ेगा।
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