24 मई विश्व सिजोफ्रेनिया दिवस पर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के जेएन मेडिकल कॉलेज के मानसिक रोग विशेषज्ञ डॉक्टर सोहेल अहमद आजमी कहते हैं कि 18 से 30 वर्ष की आयु के लोगों में सिजोफ्रेनिया अधिकांश मामलों में देखने को मिलता है। इसका उपचार संभव है, लेकिन सिजोफ्रेनिया का अगर सही इलाज न किया जाए तो करीब 25 फीसदी मरीजों के आत्महत्या करने का खतरा होता है।
भारत में विभिन्न डिग्री के सिजोफ्रेनिया से लगभग 40 लाख लोग पीड़ित हैं। सिजोफ्रेनिया का इलाज न करवा पाने वाले करीब 90 प्रतिशत रोगी भारत जैसे विकासशील देशों में हैं। कई बार जेनेटिक और पर्यावरणीय कारण मिलकर इंसान को सिजोफ्रेनिया बना देते हैं। ये स्थिति भी कई बार परिस्थितियों पर निर्भर करती है, लेकिन पर्यावरण अगर इसे प्रभावित करे तो ये समस्या कई गुना तेजी से इंसान को चपेट में ले सकती है।
सही इलाज मिलने पर सिजोफ्रेनिया के मरीज जल्दी ही स्वस्थ होकर सामान्य जिंदगी बिता सकते हैं। सही इलाज से सिजोफ्रेनिया के लक्षण जल्दी ही दूर होने लगते हैं। हालांकि ज्यादातर मामलों में मरीजों को इन लक्षणों से छुटकारा पाने में लंबा वक्त लग जाता है।