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Aligarh News: जड़-गांठ सूत्रकृमि बना औषधीय कोलियस के लिए खतरा

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एएमयू। - फोटो : Archive
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औषधीय पौधों की खेती से जुड़े किसानों के लिए एक शोध ने नई चिंता पैदा कर दी है। वैज्ञानिकों के शोध में यह खुलासा हुआ है कि जड़-गांठ सूत्रकृमि का बढ़ता प्रकोप औषधीय पौधे कोलियस फोर्स्कोहलीआई की वृद्धि, उत्पादन और औषधीय गुणवत्ता को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहा है। इस पर वैज्ञानिकों ने चिंता जताई है। एएमयू, उजबेकिस्तान, दिल्ली के वैज्ञानिकों की शोध रिपोर्ट अंतरराष्ट्रीय जर्नल स्प्रिंगर में छपी है।
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वैज्ञानिकों ने कोलियस के चयन की प्रजाति को विभिन्न स्तरों पर सूत्रकृमि संक्रमण के संपर्क में रखा। अध्ययन में पाया गया कि जैसे-जैसे सूत्रकृमि की संख्या बढ़ी, पौधों की वृद्धि और जैवभार में 16 से 52 प्रतिशत तक गिरावट दर्ज की गई। पौधे में पाए जाने वाले महत्वपूर्ण औषधीय तत्व फोर्स्कोलिन की मात्रा में 26-47 प्रतिशत तक कमी देखी गई। दिलचस्प बात यह रही कि संक्रमण के बेहद कम स्तर (250–500 जुवेनाइल प्रति किलोग्राम मिट्टी) पर पौधों ने आश्चर्यजनक सहनशीलता दिखाई। इस स्तर पर कंद उत्पादन और ताजे भार में हल्की बढ़ोतरी भी दर्ज की गई। शुरुआती स्तर पर पौधे तनाव के प्रति अनुकूल प्रतिक्रिया दे सकते हैं, लेकिन संक्रमण बढ़ने पर स्थिति तेजी से बिगड़ती है।



मिट्टी के लिए नुकसान

प्रिंसिपल कंपोनेंट एनालिसिस (पीसीए) तकनीक के जरिये यह तस्वीर साफ हो गई कि 1000 जुवेनाइल प्रति किलोग्राम मिट्टी का स्तर कोलियस के लिए सबसे खतरनाक मोड़ साबित होता है। इसी स्तर के बाद पौधों की वृद्धि, जैवभार और औषधीय गुणवत्ता में तेजी से गिरावट शुरू हो जाती है। यह शोध औषधीय खेती करने वाले किसानों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि कोलियस का उपयोग कई आयुर्वेदिक और आधुनिक औषधियों में किया जाता है। अगर सूत्रकृमि प्रबंधन पर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया तो उत्पादन के साथ-साथ औषधीय गुणवत्ता पर भी बड़ा असर पड़ सकता है।
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सूत्रकृमि प्रबंधन के प्रभावी उपाय

एएमयू के वनस्पति विभाग के अध्यक्ष प्रो. अबरार अहमद खान ने बताया कि सूत्रकृमि प्रबंधन के लिए स्वस्थ पौध सामग्री का चयन होना चाहिए। केवल रोगमुक्त बीज और पौधों का उपयोग करना चाहिए। संक्रमित नर्सरी से पौध नहीं लेना चाहिए। लगातार एक ही औषधीय फसल लगाने से बचना चाहिए। इसके अलावा जैविक प्रबंधन, मिट्टी का सौर्यकरण, गहरी जुताई, जैविक मल्च और हरी खाद, संतुलित पोषण प्रबंधन, रासायनिक नियंत्रण होना चाहिए।


शोध रिपोर्ट के लेखक



अंतरराष्ट्रीय जर्नल स्प्रिंगर में छपी रिपोर्ट के लेखक श्वेता शर्मा प्लांट पैथोलॉजी व नेमाटोलॉजी वनस्पति विभाग एएमयू, रिजवान अली समरकंद यूनिवर्सिटी उज्बेकिस्तान, तबरेज अहमद खान श्री विवेकानंद कॉलेज नई दिल्ली हैं। इन वैज्ञानिकों के अनुसार, यह अध्ययन औषधीय फसलों की सुरक्षा, बेहतर उत्पादन और टिकाऊ खेती में बनाने में सहायक होगा।
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