संजीव राजा की सबसे बड़ी पहचान सुलभ उपलब्ध जननेता के रूप में रही। उनके विषय में यह आम बात थी कि किसी का भी कभी भी वे फोन उठाते थे और कोई भी कभी भी उनसे मिल सकता था।
परिवार ने शायद ही कभी सपने में सोचा था कि संजीव राजनीति में यह मुकाम हासिल करेंगे। संघ परिवार से जुड़े द्वारिकापुरी में रहने वाले पूर्व विधायक संजीव राजा के मामा मा.ओमप्रकाश उन्हें पढ़ाने के इरादे से वजीरगंज से अपने साथ ले आए। मकसद था कि यहां पढ़ाई के साथ-साथ उनकी अचलताल स्थित पुस्तक की दुकान पर सहयोग करेंगे। बस यहां बैठकर राजनीति का ककहरा सीखकर वे कब भांजे राजा से संजीव राजा बन गए किसी को अहसास न हुआ। राजनीतिक सफर की शुरुआत एबीवीपी से हुई। फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। सांप्रदायिक दृष्टि से संवेदनशील शहर में कट्टर छवि के युवा तुर्क नेता के रूप में पहचान बनाई और सख्त निर्णय लेने के कारण कई बार बड़े विवादों से नाता पड़ा।
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वजीरगंज में ईंट भठ्ठा व गल्ला आढ़ती परिवार के रामपाल वाष्र्णेय के चार बेटों में संजीव सबसे बड़े थे। इनके बाद लवकेश, राजीव व लव हैं। राजीव वाष्र्णेय ने बताया कि बड़े भाई संजीव ने इंटरमीडिएट किया था। तभी उनके मामा ओमप्रकाश अपने व्यापार में हाथ बंटाने और श्रीवाष्र्णेय महाविद्यालय से आगे की पढ़ाई के लिए उन्हें 1981-82 के आसपास अलीगढ़ ले आए। मामा चूंकि संघ में पदाधिकारी थे और अचल रोड पर बगल में ही एबीवीपी का कार्यालय है। मामा का घर भी संघ कार्यालय के बगल में है।
इसलिए बड़े भाई संजीव का संघ व एबीवीपी से जुड़ाव होता चला गया। कब वे एबीवीपी से भाजपा तक का सफर तय कर गए। किसी को पता नहीं चला। चूंकि मामा खुद संघ से थे, इसलिए किसी तरह की पारिवारिक बाधा भी सामने नहीं आई। मामा की दुकान पर बैठने के कारण यहां उनके तमाम परिचित उन्हें भांजे राजा के रूप में पुकारते थे। इसी दौरान संघ के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने उन्हें भांजे राजा के साथ संजीव राजा नाम से पुकारा और बस यह नाम उनके साथ हमेशा के लिए जुड़ गया। इसी दौरान 1984 में संघ परिवार से ताल्लुक रखने वाली गंगीरी निवासी मुक्ता उर्फ मीनू से उनकी शादी हुई।
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सुलभ उपलब्ध जननेता के रूप में बनाई पहचान
संजीव राजा की सबसे बड़ी पहचान सुलभ उपलब्ध जननेता के रूप में रही। उनके विषय में यह आम बात थी कि किसी का भी कभी भी वे फोन उठाते थे और कोई भी कभी भी उनसे मिल सकता था। विधायक बनने के बाद भी उनका आम लोगों से मिलने, फोन रिसीव करने, समस्या समाधान कराने, पीड़ित के साथ खड़े होने का क्रम जारी था। लोगों को गली-गली वे नाम से पहचानते थे और लोग उनके व्यक्तिगत कार्यकर्ता के रूप में उनके लिए काम करते हैं। आज भी यह क्रम जारी रहता था। सबसे खास बात है कि विधायक बनने के बाद भी वे स्कूटर पर ही घूमते थे। बाद में जब लोगों ने टोका और सुरक्षाकर्मियों के साथ रहने की मजबूरी बनी तो गाड़ी से चलना शुरू किया।
संघर्ष-विवादों के चलते सुर्खियों में रहे, दो बार पार्टी से निलंबित हुए
हमेशा से जिद्दी स्वभाव और सख्त निर्णय को लेकर पहचाने जाने वाले संजीव राजा का अपने राजनीतिक जीवन में संघर्ष व विवादों से गहरा नाता रहा। एक तो भाजपा में पहचान बनाने या आगे बढऩे के लिए उनका कोई गॉड फादर नहीं रहा। वे अपनी मेहनत, संघर्ष के दम पर यहां तक पहुंचे। इस दौरान अक्सर वे जिद पर अडऩे के कारण चर्चाओं में रहे। बाद 1995-96 में महानगर अध्यक्ष पद की दावेदारी की है। शहर में तत्कालीन विधायक केके नवमान व कृष्ण गोपाल नेताजी के खेमे में अध्यक्ष पद की खींचतान थी।
इसी बीच तीसरा नाम खुद अपने दम पर संजीव राजा ने चलाया। उनकी जिद के आगे पार्टी झुकी और उन्हें अध्यक्ष बनाया गया। हालांकि बाद में अध्यक्ष पद पर फिर पहली बार शहर में चुनाव हुआ और इसका नतीजा रहा कि इसे अनुशासनहीनता माना गया और संजीव राजा को पार्टी से कुछ समय के लिए निलंबित किया गया। फिर दूसरा मौका 2012 में आया। जब पार्टी ने उनकी जगह आशुतोष वाष्र्णेय को टिकट दे दिया। इस बार भी वे बागी हो गए और पार्टी प्रत्याशी को चुनाव हराने का खुला ऐलान कर दिया। इस पर भी इन्हें कुछ समय के लिए निलंबित किया गया।
शहर में संजीव राजा की गहरी पैंठ का पार्टी को हमेशा रहा अहसास
विवाद चाहे जो भी और जितने भी रहे हों। मगर केके नवमान के बाद पार्टी को शहर में संजीव राजा की गहरी पैंठ का अहसास हमेशा रहा। इसी का परिणाम रहा कि इनका निलंबन चंद दिनों के लिए ही रहा। फिर वापस पार्टी की मुख्य धारा में जुड़कर वे काम में जुट गए।
कट्टर छवि के चलते मुकदमे लगे, पुलिस रडार पर भी रहे
संजीव राजा पर मुकदमों की बात करें तो राजनीति में आंदोलन और पुलिस प्रशासन विरोधी धरना प्रदर्शनों के चलते पहला मुकदमा 1993 में सासनी गेट में दर्ज हुआ। सरकारी कार्य में बाधा, संपत्ति के नुकसान, भीड़ एकत्रित करने आदि का आरोप है। दूसरा 2000 में बन्नादेवी में मारपीट, सरकारी कार्य में बाधा, अभद्रता, धमकी का दर्ज हुआ। तीसरा 2003 में दर्ज हुआ था, जिसमें मारपीट, अभद्रता, धमकी के आरोप हैं।
चौथा देहली गेट थाने में वर्ष 2003 में दर्ज हुआ था, जिसमें चोरी, डकैती, जान से मारने के प्रयास, सरकारी कार्य में बाधा आदि आरोप लगे थे। इस तरह कुल 6-7 मुकदमे उन पर दर्ज हुए। मगर 2003 के रोरावर कांड और 2006 के दंगे में काफी सुर्खियों में रहने के बाद ये किसी भी सांप्रदायिक घटना में हमेशा पुलिस के रडार पर रहे। इसके चलते कट्टरी छवि भी बनी और कई बार जेल भी गए।