ऊपरकोट पर हुए कार्यक्रम में मौजूद अतिथि।
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1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में देश की आजादी के लिए प्राण न्योछावर करने वाले मौलाना अब्दुल जलील सहित 73 बलिदानियों को रविवार को ऊपरकोट स्थित जामा मस्जिद में याद किया गया। इन बलदानियों की कब्रें इसी जामा मस्जिद में हैं। कब्रों पर गुलपोशी की गई।
एसएसपी नीरज जादौन ने कहा कि अंग्रेजों ने हिंदू-मुस्लिम एकता को कमजोर करने के लिए फूट डालो और राज करो की नीति अपनाई। आज जरूरत है कि इतिहास से सीख लेते हुए आपसी मतभेद दूर किए जाएं और देश की तरक्की के लिए मिलकर काम किया जाए। एकता में शक्ति है।
पूर्व महापौर मोहम्मद फुरकान ने कहा कि ऐसे आयोजन शहर में भाईचारे और आपसी एकता को मजबूत करने के साथ-साथ नई पीढ़ी को अपने गौरवशाली इतिहास से जोड़ने का काम करते हैं। एएमयू के पूर्व जनसंपर्क अधिकारी डॉ. राहत अबरार ने कहा कि आजादी की लड़ाई में हिंदू-मुस्लिम समेत विभिन्न वर्गों के लोगों ने मिलकर अंग्रेजी हुकूमत का मुकाबला किया और साझा रूप से कुर्बानियां दीं। डॉ. रेहान अख्तर, शाही जामा मस्जिद के इमाम हजरत मौलाना मुफ्ती महमूदुल हसन कासमी ने विचार व्यक्त किए। संचालन डॉ. आरिफ अली खान ने किया। कार्यक्रम संयोजक व जामा मस्जिद के सचिव मोहम्मद अहमद शेवन ने आभार व्यक्त किया।