मोदी मुखौटा और पिचकारी के साथ बच्चे
- फोटो : रूपेश कुमार
पहले होली का त्योहार पूरे-पूरे गांव और मोहल्लों के लिए हंसी-ठिठोली एवं मस्ती का पर्याय था, लेकिन अब यह मस्ती घरों परिवारों तक सिमट गई है, क्योंकि लोग छोटी छोटी बातों में खुन्नस निकालने लगे हैं। बुजुर्ग इस बदले स्वरूप को कम पसंद करते हैं।
पहले होलिका दहन के लिए बसंत पंचमी के दिन से ही लोगों की टटिया और छप्परों को उठाकर होलिका दहन स्थल पर डाल दिया जाता था और कोई बुरा नहीं मानता था। अब ऐसा नहीं होता है। गभाना के बुजुर्ग डॉ. रामपाल सिंह बोले, पहले होली आने से कई दिन पहले हंसी- ठिठोली करने का सिलसिला शुरू हो जाता था। गली, मुहल्लों में बच्चों की टोलियां हाथों में रंग, अबीर, गुलाल के साथ पिचकारियां लेकर धमाचौकड़ी करते थे। इन बच्चों पर कोई रोकटोक नहीं थी, अब बच्चों को घरों से निकलने ही नहीं दिया जाता है।
पंडित श्यामबाबू शर्मा बताते हैं कि अब इस त्योहार के मायने ही बदल गए हैं। अब वो भाईचारा नहीं रहा। वेदप्रकाश गुप्ता बताते हैं कि पहले लोग होलिका दहन के बाद टोलियों के रूप में इकट्ठे होकर ढोलक-मजीरों के साथ फाग गाते हुए होली खेलते थे। अब ऐसा नहीं है। अब डीजे का जमाना है। हरदुआगंज के उमेश पाठक एडवोकेट बताते हैं कि नई पीढ़ी को महत्व व परंपराओं लेना देना नही हैं। वह अपने अनुसार त्योहार अपनी मस्ती में मनाते हैं।