जिले के स्वतंत्रता आंदोलन के नायकों की कहानी केवल आंदोलन और जेल जाने तक ही सीमित नहीं है। देश को आजादी मिलने के बाद भी देश के सरोकारों के लिए बलिदान करने का जज्बा बना रहा।
ऐसे ही एक स्वतंत्रता सेनानी थे कुंवर नेत्रपाल सेनानी। आज के समय कोई जरा सी भी जमीन अपने भाई बांधव को देने में हिचकिचाता है। लेकिन आजादी के बाद (1952 पहले आम चुनाव) अलीगढ़ विधानसभा के पहले विधायक रहे नेत्रपाल सेनानी जब भूदान आंदोलन के दौरान आचार्य विनोबा भावे के संपर्क में आए तो अपनी 200 बीघा जमीन भूदान आंदोलन में दे दी। इससे पहले मथुरा के प्रेम महाविद्यालय में पढ़ने के दौरान ही इन्होंने 1928 में साइमन कमीशन का विरोध करते हुए काले झंडे दिखाए तो अंग्रेजी हुकूमत ने जुल्म ढाए।
सन 1933 में प्रतिबंधित कलकत्ता अधिवेशन में वहां के परेड ग्राउंड में मंच पर चढ़कर अधिवेशन का प्रस्ताव पढ़ तो अंग्रेजों ने बैतों से पीटा और कलकत्ता की अलीपुर जेल में तीन वर्ष के कठोर कारावास की सजा दी। कुंवर नेत्रपाल जयप्रकाश, नारायण, राम मनोहर लोहिया, मदन मोहन मालवीय आदि महान सेनानियों के साथ छह बार जेल की यात्रा पर गए।
महात्मा गांधी के व्यक्तिगत सत्याग्रह आंदोलन में उत्तर प्रदेश के प्रभारी रहते हुए गुजरात के वर्धा आश्रम में गांधी जी के साथ देश को स्वतंत्र कराने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सन 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में अपनी पत्नी कस्तूरी देवी व पुत्र अर्जुन सिंह के साथ जेल गए।
देश की हालत देख कैप्टन कहते थे मैं जिंदा क्यों हूं
अलीगढ़। कभी नेताजी सुभाष चंद्र बोस के साथ थे, आजाद हिंद फौज में अंग्रेजों से लड़ने वाले कैप्टन अब्बास अली कुछ वर्षों पहले तक भारत की मौजूदा व्यवस्था से बेहद आहत रहते थे। उनकी जुबां पर अक्सर ही यह बात आती थी कि ‘यह दिन देखने के लिए मैं जिंदा क्यूं हूं’। कैप्टन अब्बास अली अब हमारे बीच नहीं है। लेकिन अमर उजाला के साथ उन्होंने लंबे समय तक अपने विचार और यादें साझा कीं।
वह अक्सर हर एक मुलाकात में दावा किया करते थे कि नेताजी (सुभाष चंद्र बोस) की मौत प्लेन क्रैश में नहीं हुई। क्योंक घटना के 15 दिन बाद सिंगापुर के मैस में उन्होंने नेताजी का भाषण सुना था। वह कहते थे कि मेरी यह आंखें भला कैसे धोखा खा सकती हैं, कि जिन्होंने नेताजी को स्वयं देखा था।