मात्र दो रुपये में देेखो सिनेमा
रूपेश शर्मा
अलीगढ़। अंगुलियों और अंगूठे के बीच फंसे निगेटिव की पट्टियां। लैंस लगे कैमरेनुमा डिवाइस में एक बाद से एक कुछ ऐसे ही सेट होते जाते हैं मानो सिनेमा के प्रोजेक्टर पर रीलें दौड़ रही हाें। इन रीलों से कैैमरे में दिखाई जाने वाली कालजयी फिल्म शोले के डायलाॅग रहीस की जुबान से ऐसे निकलते जाते हैं कि खुद उस किरदार को जीने वाले एक्टर भी इतने अरसे बाद शायद ही उसी शिद्दत से बोल पाएंगे। मसलन शोले के मशहूर विलेन गब्बर सिंह (अमजद खान) का वो चर्चित डायलाग- कितने आदमी थे..? सरदार दो..। और तुम तीन..। फिर भी खाली हाथ लौट आए..? ये हाथ हमको दे दे ठाकुर..। वीरू का संवाद- बंसती इन कुत्तों के सामने मत नाचना..। हाल ही में शोले के 40 साल पूरे होने पर पूरे देश ने इस फिल्म को याद किया लेकिन रईस को सब भूल गए।
जी हां, 40 साल से रईस ऐसे सिनेमाई जुनून को जिंदा दिल किए हैं। रविवार को रईस ने फूल चौराहे से मदारगेट तक अपने पुराने अंदाज में गोल्डन जुबली फिल्में दिखाईं और शाम तक के खाने पीने का जुगाड़ किया। इस बाईस्कोप का नाम रईस सिनेमा है। फूल चौराहा निवासी रहीस को मुगल-ए-आजम, गंगा की सौगंध, कच्चे धागे, गंगा जमुना, शोले, दीवार, नमक हलाल, सच्चा झूठा, राजकुमार, शराबी, नया दौर, गाइड, गंगा जमुना सरस्वती सहित सौ से अधिक फिल्मों के एक-एक डायलाॅग याद हैं।
वह निगेटिव लगाने के बाद पूरी की पूरी कहानी हुबहू उसी अंदाज में कहते हैं मानों सामने सिनेमा का पर्दा और साउंड एक साथ हो..। खास बात ये है कि शहर के जिस इलाके में ‘रहीस सिनेमा’ घूमता है। उस इलाके में एप्पल से लेकर स्मार्ट फोन के कई शोरूम हैं। यहां की अधिकांश आबादी एडवांस स्मार्ट मोबाइल से लैस है, जिसमें एक फोन में चार से पांच फिल्मे डिजीटल मोड में चलती है। लेकिन बच्चों और युवाओं के बीच ‘रईस सिनेमा’ आज भी सुपरहिट है। पीएम नरेंद्र मोदी अमेरिका में फेसबुक और गूगल के हैडक्वार्टर में भारत के डिजीटल इंडिया अभियान को सफल बनाने का आह्वान कर रहे हैं लेकिन हमारे देश में हुनर के ‘रईसों’ का ‘नया दौर’ कभी आएगा..?