कोरोना वायरस संक्रमण के खिलाफ लड़ाई में एएमयू का जेएन मेडिकल कॉलेज जंग का मैदान बन चुका है। प्रशासन और मेडिकल कॉलेज प्रबंधन के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल रहा है, लेकिन आज से करीब साठ साल पहले मेडिकल कॉलेज की स्थापना इतनी आसान नहीं थी। इसकी शुरुआत करने में 20 साल की कड़ी मेहनत और अथक प्रयास लगे थे। यही मेडिकल कॉलेज आज पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कोरोना वायरस संक्रमण के सैंपल की जांच का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।
2 अक्तूबर 1962 को गांधी जयंती के अवसर पर विश्वविद्यालय के बायो केमिस्ट्री डिपार्टमेंट में 40 छात्रों के साथ मेडिकल कॉलेज का उद्घाटन हुआ। इसकी स्थापना की कोशिश है 1942-1943 से ही शुरू हो गई थी। प्रोफेसर हादी हसन और डॉक्टर जियाउद्दीन ने इसके लिए दिन रात एक कर दिए। एएमयू के इतिहास मामलों के जानकार डॉ. राहत अबरार कहते हैं कि डॉ. जियाउद्दीन ने तो मेडिकल कॉलेज का सामान, बेड और सर्जिकल उपकरण पहले ही खरीद लिए थे। हादी हसन ने घूम-घूम कर पैसे जुटाए, चंदा किया। 1955 में डॉक्टर जाकिर हुसैन के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल सऊदी अरब भी गया। इस प्रतिनिधिमंडल में नवाब इब्ने खान छतारी भी शामिल थे, जो आज भी मौजूद हैं। उस समय सऊदी अरब के किंग अब्दुल्ला ने 10 लाख रुपये का योगदान मेडिकल कॉलेज के लिए दिया था। डॉक्टर नकवी पहले प्रिंसिपल बने।
डॉ अबरार कहते हैं कि मेडिकल कॉलेज की स्थापना से पहले ही विश्वविद्यालय में इंस्टीट्यूट ऑफ आप्थामोलॉजी संचालित हो रहा था। जिसका उद्घाटन उस समय की स्वास्थ्य मंत्री राजकुमारी अमृत कौर ने किया था। समय के साथ-साथ मेडिकल कॉलेज का विस्तार होता गया। 1985 में तत्कालीन कुलपति हाशिम ने मेडिकल कॉलेज में सीटों की संख्या 50 से बढ़ाकर 100 कर दी।
इसके बाद 1998 में उस समय की कुलपति महमूद उर रहमान ने सीटों की संख्या बढ़ाकर 150 कर दी। साथ ही यहां पर डेंटल कॉलेज की भी स्थापना की, जिसका नाम डॉक्टर जियाउद्दीन डेंटल कॉलेज रखा गया। इस तरह मेडिकल कॉलेज पर संक्रमण फैलाने की बात कहने से पहले यह भी जानना बहुत आवश्यक है कि इस मेडिकल कॉलेज की स्थापना के लिए कितनी कोशिश और मेहनत की गई। आज इस मेडिकल कॉलेज में न सिर्फ पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सभी जिलों से बल्कि दूसरे राज्यों से भी मरीज उपचार के लिए आते हैं।