खैर सीट पर कांग्रेस का दबदबा रहा है। वर्ष 1967, 1974 और 1980 में खैर से कांग्रेस ने जीत दर्ज की थी। 2017 और 2022 में भाजपा के अनूप प्रधान ने जीत दर्ज की। लंबे समय से कांग्रेस खैर सीट पर जीत दर्ज नहीं कर सकी है। इसलिए खैर सीट पर कांग्रेस वर्षों से अपनी खो चुकी जमीन वापस लेने की कोशिश करने में जुटी है।
आपसी रार में फंसी है सीट
भले ही खैर सीट कांग्रेस की झोली में आ गई हो, मगर जिस तरह से कांग्रेस और सपा में आपसी रार मची हुई है उससे दोनों दलों के कार्यकर्ता ऊहापोह में हैं। कांग्रेस की प्रदेश इकाई में चर्चा है कि सपा ने यदि पांच सीटें नहीं दी तो कांग्रेस प्रदेश की सभी 10 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतार सकती है। यदि ऐसा होता है तो फिर सपा भी खैर और गाजियाबाद की सीट पर अपने प्रत्याशी उतार सकती है। इसका प्रभाव फिर खैर सीट पर भी पड़ेगा? इस संबंध में सपा जिलाध्यक्ष लक्ष्मी धनगर ने कहा कि टिकट के लिए पार्टी नेताओं ने आवेदन किए हैं। पार्टी जिनको टिकट देगी, उसे मजबूती के साथ लड़ाया जाएगा। कांग्रेस जिलाध्यक्ष सोमवीर सिंह ने कहा कि टिकट के लिए तीन लोगों का पैनल शीर्ष नेतृत्व को भेज दिया गया है।
चुनाव प्रचार को लेकर भी दुविधा
खैर सीट को लेकर कांग्रेस और सपा में चुनाव प्रचार को लेकर भी दुविधा है। यदि कांग्रेस दो सीटों पर ही संतोष कर लेती है तो क्या राहुल गांधी खैर सीट पर अपने प्रत्याशी के प्रचार में आएंगे या फिर गठबंधन धर्म को देखते ही राहुल गांधी और अखिलेश यादव दोनों एक साथ खैर विधानसभा क्षेत्र में एक मंच पर दिखेंगे। बहरहाल, अभी सिर्फ कयास ही लगाए जा रहे हैं, क्योंकि कांग्रेस और सपा के बीच पक रही खिचड़ी के चलते कम से कम दोनों दलों के कार्यकर्ता असमंजस में जरूर हैं।