अतरौली विधानसभा से राजनीतिक सफर शुरू करने वाले कल्याण सिंह पहली बार 1962 का चुनाव हारे। फिर 1967, 1969 व 1974 में लगातार अतरौली से विधायक चुने गए। इसके बाद कल्याण सिंह ने राजनीति में ऐसा मील का पत्थर रखा, जो हर किसी नेता के बूते से बाहर की बात है। इस बीच वे आपातकाल में 1975 व 1977 में जेल भी गए। 1977 में चौथी बार फिर जीते और स्वास्थ्य मंत्री बने। इसी बीच एक बार इंदिरा लहर में 1980 का चुनाव भी हारे। 1985 में फिर जीते और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बने। 1989 में जीतकर नेता विधायक दल चुने गए। 1991 में जीत कर मुख्यमंत्री बने। 1993 में नेता विधायक दल और 1996 में फिर जीतकर मुख्यमंत्री व भाजपा राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बने। 2000-2001 में राक्रांपा का गठन किया।
2004 में भाजपा से बुलंदशहर से सांसद बने। 2009 में एटा से निर्दल सांसद बने। 2014 में राजस्थान के राज्यपाल बने। दो बार मुख्यमंत्री बने और राजस्थान में पूरे पांच वर्ष और कुछ समय के लिए हिमाचल के राज्यपाल भी रहे। वह कुल दस बार अतरौली से विधायक का चुनाव जीते। कल्याण सिंह पिछड़े वर्ग के बड़े नेता के तौर पर जाने जाते रहे। 1992 में अयोध्या में विवादित ढांचा टूटने के बाद कल्याण सिंह हिंदुत्व छवि वाले नेता के रूप में पहचाने गए। उनकी पुत्रवधू प्रेमलता वर्मा को 2004 व 2007 में विधायक बनाया। वर्तमान में कल्याण सिंह के नाती संदीप सिंह अतरौली से लगातार दूसरी बार विधायक हैं। वर्तमान में प्रदेश सरकार में मंत्री हैं। कल्याण सिंह के बेटे राजवीर सिंह लगातार दो बार से उनकी परंपरागत सीट एटा से लोकसभा से सांसद हैं।