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क्या ‘राजा’ का नाम भी नहीं आया काम?

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सीएम की दो रैलियों में राजा महेंद्र प्रताप के नाम से विश्वविद्यालय की घोषणा भी नहीं रिझा सकी मिनी छपरौली के चौधरियों को
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वोट प्रतिशत गिरने को लेकर मंथन में जुटे हैं राजनीतिक विश्लेषक
वोट प्रतिशत गिरने से किसको होगा सबसे ज्यादा नुकसान और लाभ
अभिषेक शर्मा
अलीगढ़। चौधरियों के गढ़ और मिनी छपरौली के नाम से विख्यात इगलास सीट पर उपचुनाव में अपनी सीट वापसी के लिए भाजपा ने क्या-क्या नहीं किया। चुनाव से ऐन पहले खुद सूबे के मुख्यमंत्री ने एक महीने के अंतराल में दो बार यहां आकर जाटों के बड़े नेता राजा महेंद्र प्रताप के नाम से राज्य विश्वविद्यालय की घोषणा की। दोनों सभाएं चौधरियों के बीच हुईं। प्रदेश के तीन-तीन चौधरी मंत्री पूरे चुनाव कैंपेन में इगलास में ही डेरा जमाए रहे। इसके पीछे डर बस एक ही था कि 2017 के चुनाव में 75 हजार वोटों के अंतर से जीती हुई इस सीट पर कहीं चौधरी भाजपा से छिटक न जाएं लेकिन मतदान प्रतिशत में रिकार्ड गिरावट से ऐसा लग रहा है कि राजा महेंद्र प्रताप का नाम भी भाजपा के काम नहीं आया। गौरतलब है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने चुनावी सभा में राजा के नाम पर विवि बनवाने की घोषणा की थी।
जिन इलाकों में सर्वाधिक मतदान बहिष्कार और मतदान प्रतिशत कम हुआ है, वह चौधरियों के खांटी इलाके गोंडा और इगलास ब्लाक ही हैं। इसके बाद राजनीतिक रणनीतिकार इस मंथन में जुट गए हैं कि आखिर इतने कम मतदान प्रतिशत के परिणाम क्या होंगे? हालांकि परिणाम 24 अक्तूबर को आएंगे। मगर बड़ा सवाल जरूर खड़ा हो गया है कि अगर चौधरियों ने मतदान नहीं किया तो क्या उन्हें राजा महेंद्र प्रताप का नाम भी रिझा नहीं पाया?
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रालोद के ‘पर्चे’ ने तो नहीं बिगाड़ा काम
राजनीतिक जानकार सुबह से मतदान प्रतिशत में कमी की खबरें आने के बाद विकास और छुट्टा गोवंश को तो गुस्से का बहाना मान रहे हैं। ज्यादातर की राय पर गौर करें तो एक ही बात निकलकर आ रही थी कि जिस तरह रालोद प्रत्याशी का पर्चा इस चुनाव में निरस्त हुआ, वह चौधरियों के गुस्से की बड़ी वजह है। कहा जा रहा है कि यह विधानसभा चुनाव के इतिहास में पहली बार दर्ज हुआ है कि यहां स्व.चौधरी चरण सिंह के परिवार के समर्थन से कोई प्रत्याशी चुनाव मैदान में नहीं है। क्योंकि यह सीट चौ.चरण सिंह परिवार की राजनीतिक कर्मस्थली रही है। यहां से उनकी बीवी व बेटी विधायक रही हैं। इसीलिए इसे मिनी छपरौली भी कहा जाता है। कहीं इन तमाम वजहों से भी चौधरियों का गुस्सा इस तरह तो उभर कर नहीं आया कि वह मतदान के लिए ही न निकले और उन्होंने अपने इस गुस्से को बहिष्कार के रूप में पेश किया हो। अब वजह जो भी हो, मगर मतदान के कम प्रतिशत ने सभी की पेशानी पर बल ला दिए हैं।
9 बजे के बाद जिले भर से नेता पहुंचे, पर नहीं बढ़ा वोट
मतदान प्रतिशत की गति सुबह से ही धीम थी, मगर दिन निकलने के बाद जैसे जैसे बहिष्कार की खबरें शुरू हुईं तो भाजपा संगठन के अलावा अन्य संगठनों के नेताओं ने भी भागदौड़ शुरू कर दी। सर्वाधिक प्रभावशाली संगठन भाजपा के जिले भर के वे सभी नेता अपने-अपने बूथों पर पहुंच गए, जिन्हें चुनाव प्रचार के लिए बूथ प्रवासी बनाया गया था। हालांकि यह नियम विरुद्ध था, मगर कवायद सिर्फ वोट प्रतिशत बढ़ाने के लिए हो रही थी, इसलिए किसी ने इस ओर ध्यान नहीं दिया। इन सभी नेताओं ने भी वोटरों को समझाने के तमाम जतन किए। मगर इसके बाद भी मतदान प्रतिशत नहीं बढ़ सका।
नेताओं के बोल
कांग्रेस का प्रतिबद्ध वोटर ने वोट डाला है। जिस वोटर ने वोट नहीं डाला है वह भाजपा का वोटर है जो आवारा जानवरों की समस्या से परेशान है और मतदान से दूर रहकर अपना विरोध जताया है। आवारा जानवरों की समस्या भाजपा की पैदा की हुई है और अब भाजपा के ही पतन का करण बन रही है। इस पूरी स्थिति का फायदा कांग्रेस प्रत्याशी को होगा, क्योंकि उसका वोट कहीं नहीं गया है। इसके अलावा जनता भी समझ गई है कि बसपा और सपा मौन रहती हैं और भाजपा का मुखर होकर विरोध नहीं कर पाती हैं। केवल कांग्रेस ही है जो भाजपा का मुखर विरोध करती है। इस संदेश का लाभ भी कांग्रेस को ही मिलेगा।- विवेक बंसल, राष्ट्रीय सचिव कांग्रेस
-रालोद का पर्चा निरस्त होने से पार्टी का मतदाता नाराज हुआ। भाजपा को उम्मीद थी कि वह मतदाता उन्हें मिलेगा, मगर वह विकास व गोवंश के नाम पर गुस्से में आकर वोट डालने नहीं गया। बसपा को उसका परंपरागत वोटर पूरी तरह से मिला है। इसके अलावा हर वर्ग, जाति, धर्म का वोट मिला है। इसलिए हम अपने लिए पूरी तरह आश्वस्त हैं। जो भी परिणाम आएंगे, वह हमारे पक्ष में होंगे। हमें हमारे प्रत्याशी को लेकर उम्मीद है कि कम से कम 25 हजार वोटों से जीत दर्ज करेंगे।- तिलकराज यादव, बसपा जिलाध्यक्ष
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-मतदान प्रतिशत ने निराश किया है, जैसा उम्मीद थी, वैसा मतदान नहीं हुआ है। बहिष्कार करना गलत परंपरा है। लोगों को ऐसा नहीं करना चाहिए, बल्कि मतदान करके अपने गुस्से का इजहार करना चाहिए। मगर आज के मतदान ने यह साफ कर दिया है कि विकास, गोवंश जैसे मुद्दे लोगों की रुचि कम कर रहे हैं। लोग इतने नाराज हैं कि मतदान न करने को विवश हो रहे हैं। यह गलत चेंज है। रहा सवाल इस प्रतिशत के परिणाम का तो हमारी लड़ाई हर बूथ पर है। कहीं हम भाजपा से तो कहीं बसपा से लड़ाई लड़ रहे हैं। रोरावर, नीवरी जैसे इलाके में हमारे पक्ष में पहली बार अच्छा मतदान हुआ है।- सुनील सिंह, अध्यक्ष, लोकदल
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