यह विस्फोट कैसे हुआ? यह सवाल शहर में हर व्यक्ति की जुबां पर है। मगर घटनास्थल पर जो कुछ हुआ उसे देख एक्सपर्ट इसे मीथेन या उस जैसी किसी घातक गैस के प्राकृतिक मिश्रण वह धमाका बता रहे हैं, जो एक हजार धमाकों में एक (रेयरेस्ट ऑफ द रेयर) होता है। धमाके की क्षमता बता रही है कि यह किसी संदिग्ध पदार्थ या आतिशबाजी का असर नहीं है।
ऐसा धमाका गैस चैंबर बने बंद कमरे में प्राकृतिक गैस के मिश्रण से बने गैस क्लाउड से ही संभव है। इस धमाके की जद में आने और स्पेस मिलने पर कोई भी भारी से भारी वस्तु चकनाचूर हो सकती है। ऐसा ही यहां हुआ है। अगर अन्य किसी तरह का विस्फोट होता तो निश्चित तौर पर यहां एक्सप्लोसिव कंटेंट मिलते। मगर दूसरे दिन तक खोजी टीमें किसी तरह का कंटेंट नहीं खोज पाई हैं।
यह बात शुक्रवार को ही अमर उजाला से बातचीत में प्रसिद्ध वैज्ञानिक प्रो. वसी हैदर ने कही थी। उन्होंने बताया था कि एलपीजी सिलेंडर में मीथेन गैस होती है जो बहुत ही कंप्रेस्ड फार्म में होती है। इस सिलेंडर में 15 किलो गैस होती है। करीब 15 किलो का वजन सिलेंडर का होता है। मीथेन गैस बहुत ही ज्यादा विस्फोटक होती है। इस विषय में बातचीत के दौरान मुख्य अग्निशमन अधिकारी विवेक शर्मा जो कि खुद पेशे से केमिकल एक्सपर्ट हैं, वह बताते हैं कि पहली बात तो यह साफ है कि मौके पर किसी तरह का एक्सप्लोसिव कंटेंट नहीं मिला। हमने यह कंटेंट खोजने की बहुत कोशिश की।
दूसरी बात यह है कि एलपीजी गैस सिलेंडर में मीथेन और ब्यूटेन गैस का 40 व 60 प्रतिशत के मानक से मिश्रण होता है, जिसमें मीथेन गैस सबसे ज्यादा घातक, विस्फोटक और मारक क्षमता रखती है। इसी गैस के उबाल लेने पर ज्वालामुखी तक विस्फोट होते हैं। यहां हुए विस्फोट की मारक क्षमता को देखकर एक अनुमान यही है कि रात भर के गैस रिसाव के चलते मीथेन गैस का कमरे में प्राकृतिक गैस से मिश्रण हुआ और कमरा विस्फोटक गोला बन गया। जब उस कमरे में परिजनों ने गैस चलाई और उसने आग पकड़ ली।
इसके बाद कुछ सेकेंड में तेज धमाके के साथ वह फट गई। विवेक शर्मा बताते हैं कि मीथेन का प्राकृतिक मिश्रण एक हजार धमाकों में कभी एक धमाका इस दशा में करता है। वह बताते हैं कि धमाके के बाद जिस तरह से गाटर, पत्थर, ईंट और कमरे में मौजूद आशु व कुंवरपाल उड़े हैं, वह इसी धमाके से उड़ सकते हैं। यह भी इसी धमाके में संभव है कि जब धमाका स्थल से कोई भारी वस्तु छिटक कर दूसरे स्थान पर किसी वस्तु पर जाकर गिरेगी तो उसे भी नुकसान पहुंचाएगी। कुल मिलाकर यह गैस क्लाउड की वजह से हुई दुर्घटना है। बाकी जो भी बातें अब दूसरे दिन सामने आ रही हैं। उन्हें तो प्रयोगशाला भेजे गए सैंपलों की जांच के बाद ही समझा जा सकेगा।
पॉलिस कारखानों में प्रयोग होता विस्फोटक केमिकल
एक्सपर्ट यह भी बताते हैं कि अलीगढ़ के उन पॉलिस कारखानों में भी ऐसा विस्फोटक केमिकल प्रयोग होता है, जिनसे लोहा, स्टील, पीतल आदि उत्पादकों पर पक्का रंग चढ़ाया जाता है। उस केमिकल व रंग के मिश्रण को खुले आसमान या हवादार स्थल पर उबाला जाता है। उबालते समय ही उसमें लोहे का वह उत्पाद रंग चढ़ाने के लिए डाल दिया जाता है। जिस समय यह प्रक्रिया होती है, उसमें आसपास कोई नहीं रहता। अगर वह बंद स्थान पर प्रयोग होता है तो उसमें इसी तरह के विस्फोट होने का डर रहता है। मगर चूंकि यहां किसी तरह का अवशेष नहीं मिला। वरना उस केमिकल के अवशेष यहां जरूर मिलते।