आत्मकथा लेखन के दौरान के संस्मरण साझा करते हुए डॉ. प्रेम कुमार ने कहा, नीरज को कभी इस बात का गुमान नहीं हुआ कि वे कितने उच्च शिखर पर हैं। वे अत्यंत सहज और सरल थे। उनके भीतर हमेशा एक बच्चा जागता रहता था, जिसमें अटूट जिज्ञासा, मासूमियत और भोलापन था। यही मासूमियत उनकी कविताओं में भी झलकती है।
शृंगार से दर्शन तक का सफर
साक्षात्कार में डॉ. कुमार ने बताया कि एक समय साहित्यकारों ने नीरज को केवल शृंगार का कवि मानकर उनसे दूरी बनानी शुरू कर दी थी, जिसका उन्हें मलाल भी रहा, लेकिन बाद में दुनिया ने माना कि वे एक महान दार्शनिक कवि थे। प्रसिद्ध लेखिका मैत्रेयी पुष्पा अक्सर कहती थीं कि उनका तो प्रेम संबंध ही नीरज के पत्रों से शुरू हुआ। डॉ. कुमार कहते हैं कि जहां लोग 60 की उम्र के बाद दोहराव करने लगते हैं, वहीं नीरज गद्य और पद्य में नए प्रयोग करते रहे।
तालियां मेरी उम्र बढ़ा देती हैं
अपने जीवन के अंतिम समय तक सक्रिय रहने वाले नीरज से जब लोग बुढ़ापे में यात्रा न करने की सलाह देते थे, तो वे मुस्कुराकर कहते थे जैसे ही तालियों की गड़गड़ाहट मेरे कानों में पड़ती है, मैं अपनी उम्र भूल जाता हूँ। यही वह ऊर्जा है जो मुझे बचाए हुए है।
फिल्मी गीतों में हिंदी को दिलाई प्रतिष्ठा
डॉ. प्रेम कुमार के अनुसार, नीरज ने फिल्मी गीतों में भी हिंदी भाषा को गौरव दिलाया। उन्होंने फिल्मों में शुद्ध हिंदी शब्दों का प्रयोग कर उन्हें जन-जन तक पहुंचाया। रुबाई, गजल और लोक जीवन से जुड़े विषयों पर उनकी लेखनी ने साहित्य की हर विधा को समृद्ध किया।
(नीरज धर्म समाज महाविद्यालय के हिंदी विभाग में अध्यापक रहे। डॉ. प्रेम कुमार नीरज के विद्यार्थी भी रहे हैं और महाविद्यालय के हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष भी हैं।)