सहारा : बच्चे पर नहीं दिया ध्यान
मैरिस सड़क के एक परिवार में मां का अधिकांश समय मोबाइल पर बीतने लगा। तनाव और चिड़चिड़ेपन का असर बच्चे पर पड़ा। संवाद कम हुआ और डांट-फटकार बढ़ती गई। नतीजा यह हुआ कि बच्चे के मन में डर, असुरक्षा और गुस्सा घर करने लगा। यह मामला बताता है कि बच्चों को सुविधाओं से ज्यादा भावनात्मक सहारे की जरूरत होती है।
संवेदना : 24 साल में भी नफरत नहीं गई
अलीगढ़ के परिवार में 24 वर्षीय युवक अपनी मां को पसंद नहीं करता। काउंसलिंग में वजह पूछने पर बचपन की एक घटना सामने आई, जब गुस्से में मां ने उसे गर्म चिमटे से पीटा था। वर्षों बाद भी वह घटना उसके मन में जिंदा थी। विशेषज्ञों का कहना है कि बचपन में मिली शारीरिक या भावनात्मक चोटें कई बार उम्रभर व्यक्ति के व्यक्तित्व और रिश्तों को प्रभावित करती हैं।
संस्कार : घर में जो देखते हैं, वही सीखते हैं बच्चे
मनोवैज्ञानिक डाॅ.पूनम बत्रा बताती हैं कि बच्चे वही सीखते हैं, जो घर में देखते हैं। गुस्सा, अपमान और हिंसा उन्हें आक्रामक बना सकती है, जबकि सम्मान, धैर्य और संवाद उन्हें संवेदनशील व्यक्तित्व देता है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि मां-बाप बच्चों के बॉस नहीं, बल्कि उनके सबसे भरोसेमंद साथी बनें। क्योंकि बचपन में मिला भरोसा जीवनभर ताकत बनता है और बचपन में मिला डर कई बार पूरी उम्र पीछा नहीं छोड़ता।
माता-पिता के लिए जरूरी सुझाव
- 12 वर्ष तक की आयु में परिवार ही बच्चे का सबसे बड़ा सुरक्षा कवच होता है।
- माता-पिता और बच्चों के बीच खुला संवाद मजबूती देता है।
- बच्चों के साथ समय बिताएं, उनकी सुने, उनके सवालों पर गौर करें।
- अनुशासन जरूरी है, लेकिन अनुशासन और नियंत्रण के बीच फर्क भी समझें।
- अपनी पसंद बच्चों पर नहीं थोपना चाहिए।
नोट : बच्चों और उनके परिवारों की निजता की रक्षा के लिए मनोवैज्ञानिक की सलाह पर उनकी पहचान गोपनीय रखी गई है।