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जिले में कितनी है मिथाइल अल्कोहल, सरकारी कागजों में कोई लेखा-जोखा नहीं

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जहरीली शराब के सेवन से असमय मौत के आगोश में समाए लोगों ने जिस शराब को पिया था, वह मिथाइल अल्कोहल से बनी थी। करसुआ के ठेकों, पनैठी में पकड़े गए अवैध शराब के गोदाम और तालानगरी में पकड़ी गई इंक एंड साल्वेंट फैक्टरी के सैंपलों की जांच के बाद इस बात की पुष्टि हुई है। मगर, हैरानी की बात है कि मिथाइल अल्कोहल जैसे जहर का सरकारी रिकॉर्ड में कोई लेखा-जोखा नहीं है। आबकारी विभाग से इसका कोई भी लाइसेंस जारी नहीं हुआ, इसके चलते इसका यह विभाग रिकार्ड नहीं रखा। अब बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि आखिर जिले में औद्योगिक इस्तेमाल के नाम पर इस केमिकल को कहां से लाया जा रहा है, कितनी मात्रा में लाया जा रहा है, कितनी खपत कहां होती है आदि का रिकॉर्ड कैसे तैयार होगा। बिना रिकार्ड तैयार किए कैसे भविष्य में इसके गलत इस्तेमाल पर नियंत्रण लगेगा। अगर, नियंत्रण नहीं लग पाया तो मौत के सौदागर फिर से लालच के चलते इसका इस्तेमाल जहरीली शराब बनाने में करेंगे।
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आबकारी विभाग के मुताबिक एथाइल अल्कोहल से असली शराब बनती है। इस केमिकल पर 70 से 80 प्रतिशत की ड्यूटी प्रदेश सरकार वसूलती है। मगर, मिथाइल अल्कोहल पर कोई ड्यूटी नहीं है। इसका इस्तेमाल उद्योग में होता है। औद्योगिक इस्तेमाल की आड़ में आने वाले मिथाइल का उपयोग नकली शराब बनाने में किया जाता है। विभाग से अलीगढ़ में एथाइल अल्कोहल के दो लाइसेंसी हैं, जिनमें से एक डिस्लरी है, जिसका कोटा करीब 2.50 लाख लीटर प्रतिवर्ष है। वहीं, दूसरा लाइसेंस विजय नाम की केमिकल फैक्टरी को है, उसका कोटा 90 हजार के करीब है।
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