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Aligarh Numaish: विरासत और विकास का संगम है अलीगढ़ महोत्सव, 145 वर्षों की एक गौरवशाली महायात्रा

Fri, 23 Jan 2026 01:36 AM IST
चमन शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, अलीगढ़

सार

अलीगढ़ महोत्सव की सबसे बड़ी खूबसूरती इसकी सामूहिक भागीदारी है। यहां हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई सभी समुदायों के लोग एक ही चाट की दुकान पर खड़े मिलते हैं। यह मेला नफरतों को कम करने और दिलों को जोड़ने का काम करता है।
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अलीगढ़ की नुमाइश - फोटो : अलीगढ़ महोत्सव आधिकारिक वेबसाइट
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विस्तार
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अलीगढ़ का नाम लेते ही जहन में ताले, तालीम और तहजीब की तस्वीर उभरती है, लेकिन इन सबके साथ जो एक अहसास यहां के जर्रे-जर्रे में बसा है, वह है ....नुमाइश। राजकीय औद्योगिक कृषि प्रदर्शनी, जिसे हम प्यार से ''अलीगढ़ महोत्सव'' कहते हैं। यह मात्र एक मेला नहीं, बल्कि अलीगढ़ की रूह है।

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नुमाइश मैदान से उठती धूल और वहां गूंजती शहनाइयों में इस शहर का इतिहास और भविष्य दोनों सिमटे हुए हैं। वर्ष 1888 में एक छोटे से अंकुर के रूप में रोपा गया यह पौधा आज 145 वर्षों के सफर के बाद एक ऐसा वटवृक्ष बन चुका है, जिसकी छांव में गंगा-जमुनी तहजीब फलती-फूलती है।

तहजीब का मरकज- कोहिनूर और दरबारे-आम
नुमाइश ग्राउंड की इमारतें खुद में एक इतिहास समेटे हुए हैं। यहां का ''कोहिनूर मंच'' और ''दरबारे-आम'' गवाह हैं उन यादों के, जब देश के दिग्गज साहित्यकार, कवि और कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन करते थे। मुशायरों और कवि सम्मेलनों की वह रवायत आज भी जारी है, जहां पूरी रात शब्दों का जादू चलता है। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय और शहर के बीच की जो दूरी कभी-कभी महसूस होती है, वह इस नुमाइश मैदान में आकर पूरी तरह खत्म हो जाती है। यहां ''अदब'' और ''आम आदमी'' का मिलन होता है।
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एक सूत्र में बंधा अलीगढ़
अलीगढ़ महोत्सव की सबसे बड़ी खूबसूरती इसकी सामूहिक भागीदारी है। यहां हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई सभी समुदायों के लोग एक ही चाट की दुकान पर खड़े मिलते हैं। यह मेला नफरतों को कम करने और दिलों को जोड़ने का काम करता है। जनवरी की कड़ाके की ठंड में नुमाइश की गरम जलेबियां और यहां का शोर एक अजीब सा सुकून देता है।

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नुमाइश नहीं देखी, तो अलीगढ़ नहीं देखा

145 साल का यह सफर केवल कैलेंडर की तारीखें बदलना नहीं है, बल्कि यह अलीगढ़ के संघर्ष, उसकी कला और उसके विकास की कहानी है। मिस्टर मार्शल ने जो बीज बोया था, उसे अलीगढ़ वासियों ने अपने प्यार और मेहनत से सींचा है। 2030 की स्मार्ट सिटी में भी नुमाइश की वह पुरानी कशिश बरकरार है, जो हर अलीगढ़ी को यह कहने पर मजबूर करती है(

ऐतिहासिक सफर- अश्व प्रदर्शनी से प्रांतीय गौरव तक
  • सन 1880 - शुरुआती विचार: अलीगढ़ के तत्कालीन कलेक्टर मिस्टर मार्शल के मन में कृषि और पशुपालन को बढ़ावा देने के लिए एक आयोजन का विचार आया।
  • सन 1888 - औपचारिक जन्म: इस वर्ष पहली बार आधिकारिक तौर पर ''अश्व प्रदर्शनी'' के रूप में इसकी शुरुआत हुई। इसका मुख्य उद्देश्य घोड़ों की नस्ल सुधारना और किसानों को उन्नत खेती के लिए प्रोत्साहित करना था।
  • सन 1920 - औद्योगिक विस्तार : समय के साथ इसमें ताला उद्योग और स्थानीय कारीगरी को जोड़ा गया, जिससे इसका नाम ''औद्योगिक प्रदर्शनी'' की ओर मुड़ा।
  • सन 1950 के बाद - राजकीय स्वरूप : आजादी के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने इसे ''राजकीय'' दर्जा दिया। अब यह केवल स्थानीय आयोजन नहीं रहा, बल्कि एक प्रांतीय महोत्सव बन गया।
  • आधुनिकता का तड़का : 1888 की वह अश्व प्रदर्शनी आज 21वीं सदी के डिजिटल अलीगढ़ महोत्सव में बदल चुकी है।
  • कृषि से तकनीक तक : पहले जहां सिर्फ हलों और बैलों की चर्चा होती थी, आज वहां ड्रोन तकनीक, हेल्थ एटीएम और स्मार्ट सिटी के स्टॉल लगते हैं।
  • व्यापार का बड़ा मंच : अलीगढ़ के ताला और हार्डवेयर उद्योग के लिए यह साल का सबसे बड़ा बिजनेस हब है। यहां करोड़ों का व्यापार होता है और स्थानीय कारीगरों को वैश्विक पहचान मिलती है।
  • मनोरंजन का महाकुंभ : मौत का कुआं, विशाल झूले और देशभर के जायकों से सजी ''खाद्य गली'' बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक को अपनी ओर खींचती है।
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