145 साल का यह सफर केवल कैलेंडर की तारीखें बदलना नहीं है, बल्कि यह अलीगढ़ के संघर्ष, उसकी कला और उसके विकास की कहानी है। मिस्टर मार्शल ने जो बीज बोया था, उसे अलीगढ़ वासियों ने अपने प्यार और मेहनत से सींचा है। 2030 की स्मार्ट सिटी में भी नुमाइश की वह पुरानी कशिश बरकरार है, जो हर अलीगढ़ी को यह कहने पर मजबूर करती है(
ऐतिहासिक सफर- अश्व प्रदर्शनी से प्रांतीय गौरव तक
- सन 1880 - शुरुआती विचार: अलीगढ़ के तत्कालीन कलेक्टर मिस्टर मार्शल के मन में कृषि और पशुपालन को बढ़ावा देने के लिए एक आयोजन का विचार आया।
- सन 1888 - औपचारिक जन्म: इस वर्ष पहली बार आधिकारिक तौर पर ''अश्व प्रदर्शनी'' के रूप में इसकी शुरुआत हुई। इसका मुख्य उद्देश्य घोड़ों की नस्ल सुधारना और किसानों को उन्नत खेती के लिए प्रोत्साहित करना था।
- सन 1920 - औद्योगिक विस्तार : समय के साथ इसमें ताला उद्योग और स्थानीय कारीगरी को जोड़ा गया, जिससे इसका नाम ''औद्योगिक प्रदर्शनी'' की ओर मुड़ा।
- सन 1950 के बाद - राजकीय स्वरूप : आजादी के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने इसे ''राजकीय'' दर्जा दिया। अब यह केवल स्थानीय आयोजन नहीं रहा, बल्कि एक प्रांतीय महोत्सव बन गया।
- आधुनिकता का तड़का : 1888 की वह अश्व प्रदर्शनी आज 21वीं सदी के डिजिटल अलीगढ़ महोत्सव में बदल चुकी है।
- कृषि से तकनीक तक : पहले जहां सिर्फ हलों और बैलों की चर्चा होती थी, आज वहां ड्रोन तकनीक, हेल्थ एटीएम और स्मार्ट सिटी के स्टॉल लगते हैं।
- व्यापार का बड़ा मंच : अलीगढ़ के ताला और हार्डवेयर उद्योग के लिए यह साल का सबसे बड़ा बिजनेस हब है। यहां करोड़ों का व्यापार होता है और स्थानीय कारीगरों को वैश्विक पहचान मिलती है।
- मनोरंजन का महाकुंभ : मौत का कुआं, विशाल झूले और देशभर के जायकों से सजी ''खाद्य गली'' बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक को अपनी ओर खींचती है।