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प्रेमचंद जयंती आज : अमर उजाला संवाद में उपन्यास सम्राट पर चर्चा, सबकी एक ही राय- कालजयी है उनका साहित्य

Mon, 31 Jul 2023 05:29 AM IST
चमन शर्मा इकराम वारिस, अमर उजाला, अलीगढ़

सार

प्रेमचंद हिंदी-उर्दू ही नहीं, बल्कि हिंदुस्तान के बड़े साहित्यकार हैं। प्रेमचंद ने अपने साहित्य के जरिये शोषित-पीड़ित, धर्म, राजनीति, जातिवाद, अंधविश्वास, अंग्रेजों की हुकूमत से मुक्ति की बात कही थी। प्रेमचंद ने उस समय किसानों की समस्याओं को दिखाया, जो आज भी है। प्रेमचंद के साहित्य का उद्देश्य था कि जनता जागरूक हो।
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प्रेमचंद - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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प्रेमचंद को अपनी लेखनी की वजह से अंग्रेजी हुकूमत में सजा भी भुगतनी पड़ी। नवाब राय के नाम से पहली बार कहानी संग्रह सोज-ए-वतन प्रकाशित हुई, लेकिन वह अंग्रेज हुक्मरां को नागवार गुजरा। उसकी प्रतियां जला दी गईं। यहीं से उन्हें राष्ट्र प्रेम से प्रेरित कहानियां लिखने का जुनून और हो गया। अमृतलाल नागर लिखते हैं कि प्रेमचंद ने हमें स्वाभिमान से लिखना सिखाया। प्रेमचंद की जयंती के उपलक्ष्य में रविवार को अमर उजाला कार्यालय में संवाद कार्यक्रम में शहर के हिंदी के शिक्षकों, साहित्यकारों और विद्यार्थियों ने राय रखी और उन्हें अपने शब्दों से श्रद्धांजलि अर्पित की।

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भारत के बड़े साहित्यकार हैं प्रेमचंद
प्रेमचंद हिंदी-उर्दू ही नहीं, बल्कि हिंदुस्तान के बड़े साहित्यकार हैं। प्रेमचंद ने अपने साहित्य के जरिये शोषित-पीड़ित, धर्म, राजनीति, जातिवाद, अंधविश्वास, अंग्रेजों की हुकूमत से मुक्ति की बात कही थी। प्रेमचंद ने उस समय किसानों की समस्याओं को दिखाया, जो आज भी है। आज भी किसानों पर जीप चढ़ा दी जाती है। प्रेमचंद के साहित्य का उद्देश्य था कि जनता जागरूक हो। प्रेमचंद मानते थे कि धर्म का मूलतत्व मनुष्यता है, लेकिन यह मनुष्यता छिन्न-भिन्न हो रही है।
-प्रो. आशिक अली, अध्यक्ष हिंदी विभाग, एएमयू

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उत्तरी भारत को समझने के लिए पढ़ें प्रेमचंद का साहित्य
एकतरफ तो हम प्रेमचंद को आदर्शवादी कहते हैं तो दूसरी तरफ उन्हें दलित विरोधी, सनातन विरोधी कहते हैं। दोनों बातें एक साथ कैसे कही जा सकती हैं। आप उत्तरी भारत को ठीक से समझना चाहते हैं तो प्रेमचंद को पढ़िए। कालजयी साहित्य हमेशा प्रासंगिक होता है। यह साहित्यकार का कौशल है। महाभारत, रामायण आज भी प्रासंगिक है। उसी तरह से प्रेमचंद का साहित्य भी प्रासंगिक है। प्रेमचंद ने अपने साहित्य में स्त्री-पुरुष समानता और सामाजिक मुद्दे को रेखांकित किया है। -अजय बिसारिया, हिंदी विभाग, एएमयू



रामचरित मानस और गोदान मांगेंगे
प्रेमचंद हिंदी कथा साहित्य के उन्नायक ही नहीं है, बल्कि स्थापक है। अगर मुझे जेल में डाल दिया जाए और मुझसे कहा जाए कि क्या चाहिए, तो मैं बस दो साहित्य मांगूगा, एक रामचरित मानस और दूसरा प्रेमचंद का गोदान। 100 साल के बाद भी आज प्रेमचंद पर चर्चा हो रही है, यह ही उनके बड़े साहित्यकार होने के लिए साबित करती है। प्रेमचंद के साहित्य में आदर्श न होता तो वह कालजयी न होते। उनका साहित्य सरल और सहज है, जिसे पढ़ने में आनंद आता है। -डॉ. प्रभाकर शर्मा, पूर्व अध्यक्ष हिंदी विभाग डीएस कॉलेज

प्रेमचंद की आदर्श वाली कहानी रिझाती हैं सभी को
प्रेमचंद की आदर्श वाली कहानी सभी को रिझाती हैं। प्रेमचंद ने जनमानस में हिंदी के प्रति रुचि रखने वाला पूरा वर्ग विकसित किया। प्रेमचंद रचनाकार होने के साथ, वह समाज के प्रबुद्ध व्यक्ति भी थे। जब प्रेमचंद प्रगतिशील संघ के अध्यक्ष थे, तो उन्होंने लखनऊ में आयोजित सम्मेलन में कहा थी कि प्रगतिशील शब्द ही निरर्थक है, क्योंकि साहित्यकार हमेशा प्रगतिशील रहता है। वर्ष 1932 के बाद प्रेमचंद के भाषा और रचना में तेवर था। उन्होंने जैनेंद्र से आखिरी वक्त में कहा था कि अब आदर्शवाद से काम नहीं चलेगा। -डॉ. अरुण कुमार सिंह, शिक्षक हिंदी विभाग, एचबी इंटर कॉलेज

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गोदान है महाकाव्य

प्रेमचंद के गोदान को महाकाव्य की संज्ञा दी गई है। प्रेमचंद का हिंदी ही नहीं, बल्कि उर्दू में भी कोई तोड़ नहीं है। सर्वाधिक पाठक कहीं मिलते हैं, तो वह प्रेमचंद के ही मिलते हैं। बच्चों के लिए लिखी कहानियों को उनके अभिभावक भी बड़े चाव से पढ़ते हैं। प्रेमचंद आम बोलचाल की भाषा से कभी डिगे नहीं, जिसे उस समय भी लोग गलत कहते थे। 100 साल पहले हिंदी साहित्य की नींव प्रेमचंद ने डाली थी, वह आज भी मान्य है। वह आज के समय के सर्वमान्य साहित्यकार हैं।
-सुरेश कुमार, गजलकार व साहित्यकार

प्रेमचंद हैं हिंदी-उर्दू के युग प्रवर्तक लेखक

प्रेमचंद हिंदी के स्वतंत्रता आंदोलन और नवजागरण काल के सर्वाधिक लोकप्रिय और जाने-माने और पढ़े गए हिंदी-उर्दू के युग प्रवर्तक लेखक हैं। उनकी गांव और शहर की जिंदगी और वहां के पात्रों को लेकर लिखी गई रचनाएं एक समय में शिक्षितों को नहीं, अनपढ़ लोगों के लिए भी रिझाती रही हैं और उन्हें बेहतर इंसान बनाने में उन्होंने बहुत काम किया है। सामाजिक समस्याओं, कुरीतियों और पाखंडों को लेकर उन्होंने जिस साहस और बहादुरी के साथ आमजन की हिंदुस्तानी भाषा का उपयोग किया है, वह सराहनीय और सीखने योग्य है। उनकी लोकप्रियता कई बार तुलसीदास और कबीरदास की लोकप्रियता जितनी विस्तृत और सम्मानीय दिखाई देती है। 20वीं शताब्दी के प्रारंभ के समाज को जानने के लिए प्रेमचंद का साहित्य बेहद प्रमाणिक और विश्वसनीय है। उनके संपादक और फिल्म लेखक के रूप में उनको याद किया जाता है। सच है कि वह अपने समाज और समय के बड़े लेखक हैं, लेकिन साहित्य ने उनसे काफी आगे तक की यात्रा तय कर ली है।
-डॉ. प्रेमकुमार, वरिष्ठ साहित्यकार

प्रेमचंद का भाषाई कौशल अतुलनीय
प्रेमचंद की कोई कहानी ऐसी नहीं होगी, जिसमें दो वाक्य पढ़ लो, तो उसके बाद मुहावरा न मिल जाए। नमक के दरोगा मे कहीं गही यह बात आज के समय में भी देखने को मिलती है। उसमें कहा गया है कि नौकरी में ओहदे की ओर ध्यान मत देना, यह तो पीर का मजार है। निगाह चढ़ावे और चादर पर रखनी चाहिए। ऐसा काम ढूंढना जहां कुछ ऊपरी आय हो। मासिक वेतन तो पूर्णमासी का चांद है, जो एक दिन दिखाई देता है। उनका भाषाई कौशल अतुलनीय है। वही जिंदा रहेगा, जो हिंदुस्तानी भाषा की बात करेगा। -डॉ. चंद्रशेखर शर्मा, शिक्षक, हिंदी विभाग, ब्रिलिएंट पब्लिक स्कूल

प्रेमचंद का साहित्य और कविताएं ऐसी ही हैं, जिन्हें पढ़ते समय व्यक्ति उसमें डूब जाता है। उनका साहित्य अद्भुत व अद्वितीय है।
-डॉ. ऊषा शर्मा

प्रेमचंद के साहित्य में महिलाओं के दर्द, जानवरों से प्रेम को भी रेखांकित किया गया है। निर्मला और पूस की रात ही उनकी ऐसी ही रचना है।
-निर्मला, 

प्रेमचंद का साहित्य पथ प्रदर्शक है। सामाजिक कुरीतियों को उन्होंने अपने साहित्य के जरिये रेखांकित किया है।
-राशि, छात्रा हिंदी विभाग, एएमयू

प्रेमचंद का साहित्य युवाओं को संदेश देता है। प्रेमचंद ने साहित्य के जरिये कई समस्याओं को लेकर रेखांकित है।
-नितेश, छात्र, हिंदी विभाग, एमएयू
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