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हिंदी हैं हमः कविवर नाथूराम शंकर शर्मा की स्मृति से गौरवान्वित हरदुआगंज

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कवि नाथूराम शंकर शर्मा का फाइल फोटो। - फोटो : HARDUAGANJ
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महान कवि नाथूराम शंकर शर्मा ‘शंकर’ को अपनी माटी में जन्म देकर हरदुआगंज गौरवान्वित है। डेढ़ वर्ष की अवस्था में विजयादशमी के दिन मां के परलोक सिधारने पर नानी कुछ वर्ष नानी की छत्रछाया में रहने और बुआ की परवरिश के बाद हरदुआगंज लौटे नाथूराम शंकर शर्मा की अल्पकाल में ही प्रखर बुद्धि की सुगंध यहां की गलियों में फैल गई थी। नक छिद्दा, नत्था और नथुआ नाम को अतीत के पन्नों में छोड़कर वह कवि नाथूराम शंकर शर्मा ‘शंकर’ के नाम से वह विश्वविख्यात हुए। उनके जरिए हरदुआगंज को आज भी साहित्य की दुनिया में आदर से पावन धरा के रूप में पहचाना जा रहा है।
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वर्ष 1859 को पंडित रूपराम के यहां जन्मे नाथूराम की राशि का नाम कृष्ण चंद्र रखा गया था, लेकिन उनके तीन भाइयों की अकाल मृत्यु के चलते अंधविश्वास में माता-पिता ने कृष्ण चंद्र की नासिका को छिद्रित करा दिया। इसके बाद उन्हें नक छिद्दा, नत्था और नथुआ नाम मिले। डेढ़ वर्ष के थे, जब विजयादशमी (दशहरा) के दिन मां की छाती से वह लिपटे थे और मां का शरीर बेजान हो चुका था। हरदुआगंज में ही ननिहाल थी। नानी ने उनकी देखरेख का बीड़ा उठाया। कुछ दिनों बाद बुआ उन्हें अनूपशहर ले गईं। नौ वर्ष के होने पर वह हरदुआगंज लौटे।
आरंभिक शिक्षा हरदुआगंज में हुई। हिंदी और उर्दू में मिडिल परीक्षा उत्तीर्ण की। कानपुर में पं. देवदत्त शास्त्री से संस्कृत का सम्यक ज्ञान प्राप्त किया। हरदुआगंज में ही पं चुन्नीलाल की बेटी गुलाब देवी से विवाह हुआ। ‘शंकर’ नाम उन्हें पं. प्रताप नारायण मिश्र ने दिया था। इससे प्रभावित होकर उन्होंने अपनी पत्नी का नाम गुलाब देवी से शंकरा देवी कर दिया। संतानों के नाम के साथ भी शंकर जोड़ दिया। पुत्रों के नाम उमाशंकर शर्मा, रविशंकर शर्मा, हरिशंकर शर्मा, सतीशंकर शर्मा और बेटी का नाम महाविद्या रखा।
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ब्राह्मण पत्रिका से शुरू किया लेखन
नाथूराम ने कानपुर से अपनी लेखनी को धार देना शुरू किया। कानपुर से प्रकाशित ब्राह्मण पत्रिका में उन्होंने लेख देना शुरू किया। हरदुआगंज लौटने पर कविंताएं लिखीं। नाथूराम संधिकाल के कवि हैं। उनकी प्रारंभिक रचनाएं भारतेंदु युग के पारंपरिक विषयों, शृंगार आदि में हुईं। देश-प्रेम और समाजोत्थान से संबंधित उनकी रचनाएं द्विवेदी युग की हैं। गुलजारे चमन, दानी हरिश्चंद्र, सुंदरी-स्वप्न-प्रकाश, चौक चांदनी, शंकर सरोज, अनुराग रत्न, गर्भरण्डा-रहस्य, वायस-विजय, कलित कलेवर, शंकर-सतसई उनकी प्रमुख काव्य कृतियां हैं। मैथिलीशरण गुप्त, आचार्य पद्मसिंह शर्मा, महावीर प्रसाद द्विवेदी, अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध, गणेश शंकर विद्यार्थी, पदुमलाल पन्नालाल बख्शी, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, रामधारी सिंह दिनकर, हजारी प्रसाद द्विवेदी, महादेवी वर्मा और काका हाथरसी जैसे हिंदी साहित्य के पुरोधाओं ने उनकी रचनाओं की खुलेमन से प्रशंसा की है।
कवि की स्मृति को सहेजे है हरदुआगंज
कविवर नाथूराम शंकर शर्मा ‘शंकर’ को गुमनामी के अंधेरे से निकालने और आज की पीढ़ी को उनसे परिचित कराने का काम हरदुआगंज निवासी इं. देशराज सिंह ने किया। उनके जीवन से जुड़ी सामग्री को उन्होंने सहेजा। वर्ष 1990 में ‘महाकवि शंकर स्मृति ग्रंथ’ प्रकाशित कराया। 29 जून 2013 में घर के बाहर पीतल की प्रतिमा को स्थापित कर हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस सखाराज की अध्यक्षता में कर्नाटक के पूर्व राज्यपाल टीएन चतुर्वेदी से अनावरण कराया। दिल्ली के हिंदी भवन में कवि शंकर का तेल चित्र लगवाया। इं. देशराज सिंह के पुत्र और हरदुआगंज नगर पंचायत के चेयरमैन तिलकराज यादव ने कस्बे के हनुमानगढ़ी रोड को कवि नाथूराम शंकर शर्मा मार्ग घोषित किया। कस्बे में शंकर कवि के नाम से रामघाट रोड और जलाली रोड पर स्मृति द्वार बनवाए गए हैं। दिसंबर 2020 में कवि डॉ. अंजना सिंह सेंगर ने हरदुआगंज नगर पंचायत में शंकर के तेल चित्र का अनावरण किया। नगर पंचायत के चेयरमैन तिलकराज यादव का कहना है कि महान कवि के नाम पर नगर पंचायत में एक सभागार बनवाने पर विचार चल रहा है।

इं देशराज सिंह।- फोटो : HARDUAGANJ

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