नई सदी की शुरुआत में हिंदी की एक प्रतिष्ठित पत्रिका ने बीसवीं सदी के हिंदी कथा साहित्य की पड़ताल करते हुए पाठकों आलोचकों के बीच एक सर्वेक्षण कराया और सदी के 10 शीर्ष उपन्यासों की सूची प्रस्तुत की। राही मासूम रजा का आधा गांव उनमें से एक था। प्रख्यात कथाकार राही मासूम रजा भी प्रेमचंद की तरह उर्दू से हिंदी में आए। छठे दशक के मध्य में जब वे अलीगढ़ आए और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में बीए में प्रवेश लिया, तब उनकी ख्याति एक प्रतिष्ठित और लोकप्रिय शायर के रूप में थी। एएमयू से एमए और पीएचडी करने के बाद वे उर्दू विभाग में प्रवक्ता नियुक्त हो गए। बाद में विशेष परिस्थितियों के कारण 1967 में उन्हें अलीगढ़ छोड़कर मुंबई प्रस्थान करना पड़ा।
उनका पहला बहुचर्चित उपन्यास आधा गांव 1966 में छपा और हिंदी जगत में प्रशंसित हुआ। पहले स्वाधीनता संग्राम के 100 वर्ष पूरे होने पर उनकी काव्य पुस्तक अठारह सौ सत्तावन छपी, जिसकी भूमिका उतर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री संपूर्णानंद ने लिखी थी। बाद में इसका संशोधित संस्करण क्रांति कथा के नाम से छपा। एक अन्य काव्य पुस्तक छोटे आदमी की बड़ी कहानी भी 1966 में छपी जो 1965 के भारत-पाक युद्ध के नायक अब्दुल हमीद की जीवनी पर है। राही ने अपना पहला उपन्यास आधा गांव उर्दू लिपि में लिखा, जिसका देवनागरी में लिप्यंतरण उनके मित्र कुंवर पाल सिंह ने किया। यह उपन्यास राही के गाजीपुर के गांव गंगौली को आधार बनाकर लिखा गया। इसमें आजादी से पहले और आजादी मिलने के बाद बदली राजनीतिक और सामाजिक जीवन की तस्वीर प्रस्तुत होती है। राही एक सजग दृष्टि वाले संवेदनशील लेखक थे। उनके व्यापक सामाजिक सरोकार और वे निरंतर विघटनकारी शक्तियों से संघर्ष करते रहे। उन्होंने अपने अन्य सभी उपन्यासों टोपी शुक्ला, ओस की बूंद, हिम्मत जौनपुरी, दिल एक सादा कागज, कटरा बी आर्जू , सीन-75और असंतोष के दिन में भी भारतीय समाज की विविध जटिल समस्याओं का गठन चित्रण किया है।
मुंबई जाने के बाद वहां भी लंबे संघर्ष के बाद एक सफल और प्रतिष्ठित और पटकथा लेखक के रूप में स्थापित हुए। उनका एक बड़ा योगदान महाभारत सीरियल की पटकथा और संवाद लेखन से जुड़ा है। बीआर चोपड़ा ने यह सूचना प्रसारित करा दी थी कि महाभारत की पटकथा और संवाद राही लिखेंगे। इस सूचना के बाद मानो भूचाल आ गया हो। लोगों ने कहा कि एक मुसलमान से महाभारत के संवाद और पटकथा लिखाए जा रहे हैं। राही भारतीय संस्कृति और पौराणिकता को क्या समझेंगे? बहुत लोगों ने बीआर चोपड़ा को विरोध में पत्र भी भेजे। शुरुआत में राही ने बीआर चोपड़ा के महाभारत की पटकथा के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया था, लेकिन इस विरोध के बाद राही अपने रूप में आ गए । उन्होंने कहा मैं भी इस हिंदुस्तान का पुत्र हूं, इसकी संस्कृति, धार्मिक विरासत का हकदार हूं। अब तो मैं ही महाभारत के संवाद और पटकथा लिखूंगा। उसके बाद राही की कलम ने ऐसा कमाल किया कि उनके लिखे संवाद घर-घर में गूंजने लगे ।
राही कहते थे कि उनकी तीन मां हैं। एक जिन्होंने उन्हें जन्म दिया, दूसरी अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी जिसने उन्हें शैक्षिक-साहित्यिक चेतना और संस्कार दिए और तीसरी मां गंगा जो उनके लहू में बहती है। उन्होंने एक लंबी नज्म लिखी थी जिसमें अपनी वसीयत लिखते हुए उन्होंने इच्छा व्यक्त की थी कि मरने के बाद उन्हें गंगा की गोद में सुला दिया जाए।