फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

हिंदी हैं हम : अतरौली से निकलकर आलोचना के शिखर तक का सफर

विज्ञापन
डा. चंद्रशेखर शर्मा, साहित्यकार। - फोटो : CITY OFFICE
विज्ञापन
अलीगढ़ की भूमि साहित्य के क्षेत्र में अत्यंत उर्वरा रही है। अनेक हिंदी सपूतों ने अपनी सर्जनात्मक प्रतिभा से हिंदी और अलीगढ़ का मस्तक पूरे विश्व में ऊंचा किया है। डॉ. नगेंद्र भी हिंदी के उन्हीं सपूतों में से एक हैं। अलीगढ़ जनपद के छोटे से कस्बे अतरौली में 22 मार्च 1915 को (डॉ. नगेंद्र ग्रंथावली के अनुसार) जन्मे डॉ. नगेंद्र ने हिंदी साहित्य और विशेषकर आलोचना साहित्य के क्षेत्र में भी बहुत ख्याति अर्जित की।
विज्ञापन

अतरौली में उन्हें जानने वाले बताते हैं कि बचपन में नगाइचपाड़ा की संकरी गलियों में घूमने वाला यह बालक अपनी तार्किक क्षमता से सभी को प्रभावित कर देता था। उन्होंने हिंदी और अंग्रेजी दोनों ही भाषाओं में परास्नातक किया। हिंदी से डी.लिट् भी किया। ऑल इंडिया रेडियो और दिल्ली विश्वविद्यालय में अपनी सेवाएं दीं। वे दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के दो बार अध्यक्ष भी रहे। भारत सरकार द्वारा उन्हें पद्म भूषण से अलंकृत किया गया। उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा उन्हें भारत भारती से तथा रस सिद्धांत (काव्य शास्त्र) के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से भी पुरस्कृत किया गया।
27 अक्तूबर 1999 को हिंदी का यह महान आलोचक चिर निद्रा में लीन हो गया। आधुनिक हिंदी आलोचना साहित्य को समृद्ध करने में डॉ. नगेंद्र का योगदान रेखांकित किए जाने योग्य है। उन्हें काव्य शास्त्र के प्रकांड विद्वान के रूप में ख्याति अर्जित है। उनके विषय में यह भी ध्यातव्य है कि उन्होंने अपने लेखन की शुरुआत कवि के रूप में की। 1937 में प्रकाशित कविता संग्रह वनबाला पर बहुत कम चर्चा हुई है। इस कविता संग्रह में उनके विद्यार्थी और किशोर जीवन की कविताएं हैं। हां, आलोचक के रूप में अपार ख्याति उन्हें मिली। भाषा की दृष्टि से भी नगेंद्र जी अत्यंत समृद्ध हैं। नए शब्दों के निर्माण में उन्हें महारथ हासिल थी।
विज्ञापन

डॉ. नगेंद्र की प्रमुख आलोचनात्मक कृतियों में ‘साकेत : एक अध्ययन, नई समीक्षा : नएं संदर्भ, फ्रायड और हिंदी साहित्य, आधुनिक हिंदी नाटक, देव और उनकी कविता, आस्था के चरण, आलोचक की आस्था, साहित्य का समाजशास्त्र, रस सिद्धांत, रीतिकाव्य की भूमिका, समस्या और समाधान, काव्य बिम्ब, मिथक और साहित्य, सुमित्रानंदन पंत, विचार और अनुभूति, विचार और विश्लेषण, विचार और विवेचन, मैथिलीशरण गुप्त : पुनर्मुल्यांकन’ आदि हैं। निश्चित रूप से यह कहा जा सकता है कि डॉ. नगेंद्र के रूप में न सिर्फ अलीगढ़ अपितु पूरे देश को एक महान हिंदी सेवी और रसवादी आचार्य मिला जिसने हिंदी को सभी स्तरों पर समृद्ध किया। उन्हें रसवादी आलोचक के रूप में सदैव याद किया जाएगा।
विज्ञापन

- डॉ. चंद्रशेखर शर्मा
(लेखक हिंदी के शिक्षक और साहित्यकार हैं)
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें