हिंदी यूनिवर्स फाउंडेशन नीदरलैंड की निदेशक प्रो. पुष्पिता अवस्थी ने कहा कि जिस तरह भारत में जाति-धर्म का भेद दिखाई देता है, उस तरह सूरीनाम, फिजी और मॉरिशस आदि देशों में नहीं दिखाई देता। उन्होंने उसे समाप्त कर दिया है। भारत को इससे सीखना चाहिए।
प्रो. पुष्पिता अवस्थी गुरुवार को एएमयू में एक कार्यक्रम के सिलसिले में आई थीं। अमर उजाला से बातचीत में उन्होंने कहा कि हिंदी की स्थिति भारत से अच्छी विदेशों में है। सूरीनाम, फिजी एवं मॉरिशस आदि देशों में तो लोग हिंदुस्तानी जबान बोलते हैं। जब दो लोग मिलते हैं तो पूछते हैं कि ‘का भैया का हाल बा’।
बगल से फ्रेंच या जर्मन गुजर जाए तो कोई मतलब नहीं। वे लोग भी जब आपस में मिलते हैं तो अपनी भाषा में बात करते हैं। उन्होंने कहा कि प्रवासियों ने विदेशों में रहते हुए अपनी संस्कृति नहीं छोड़ा। भाषा में संस्कृति बचाई है और संस्कृति से मातृभूमि बचाई है। कोई भी आदमी मातृभूमि अपने साथ नहीं ले जा सकता। वह अपनी संस्कृति एवं भाषा के माध्यम से उसे दिल से महसूस कर सकता है। प्रवासी लोग आज भी अपने आप को हिंदुस्तानी कहते हैं।
प्रो. पुष्पिता अवस्थी ने कहा कि जब भारत के गांवों से किसान-मजदूर गए तो ग्रामीण संस्कृति, लोकगीत, नवरात्रि, हनुमान जयंती आदि साथ लेकर गए। आज भी वह होली एवं ईद साथ-साथ मनाते हैं। प्रवासी इन देशों में प्रधानमंत्री, लोकसभा के स्पीकर, गवर्नर आदि महत्वपूर्ण पदों पर हैं या पहुंचे। ‘भारत’ शब्द का उच्चारण भारत से अधिक विदेशों में होता है और यह भारतवंशियों द्वारा होता है। दुर्भाग्य है कि ‘भारत’ भारत में ‘इंडिया’ है और बाहर ‘भारत’ है। उन्होंने कहा कि किसी भी देश का दो नाम नहीं हो सकता। फ्रांस फ्रांस है, जर्मनी जर्मनी एवं स्पेन स्पेन है। भारत अपने ही देश में ‘भारत’ और ‘इंडिया’ में बंट गया। अंग्रेजी बोलने वाले लोगों ने दूसरा भारत रचा है, जिसे वो इंडिया बोलते हैं।
पुष्पिता पर एएमयू में हो रहा शोध
प्रो. पुष्पिता अवस्थी हिंदी यूनिवर्स फाउंडेशन नीदरलैंड की निदेशक हैं। विदेशों में भारत को जिंदा रखने के लिए प्रो. पुष्पिता अवस्थी पिछले 15-20 साल से कार्य कर रही हैं। भारतीय साहित्य, परंपरा और भारतीयता को जिंदा रखने के लिए कैंप आयोजित करती हैं। मंदिरों में जाकर भारतवंशियों को हिंदी पढ़ाती हैं। हिंदी, अंग्रेजी के अतिरिक्त डच भाषा में भी कई पुस्तकें लिख चुकी हैं। एएमयू के दो शोधार्थी उनपर शोध कर रहे हैं। हिंदी विभाग के अकरम हुसैन ‘सूरीनाम के गद्य साहित्य में पुष्पिता अवस्थी का योगदान’ विषय पर शोध कर रहे हैं। इसके अलावा मोहम्मद बिलाल प्रवासी साहित्य पर शोध कर रहे हैं।
यूरोप को यूरोप बनाने में भारतीयों की अहम भूमिका : प्रो. पुष्पिता
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग द्वारा विश्वविद्यालय प्रसार व्याख्यानमाला के तहत भारतीय अस्मिता और वैश्विक संस्कृति विषय पर व्याख्यान का आयोजन किया गया। नीदरलैंड के हिंदू यूनिवर्स फाउंडेशन की निदेशक प्रो. पुष्पिता अवस्थी ने कहा कि भारतवंशी बहुत ऊर्जावान हैं। यूरोप को यूरोप बनाने में भारतीयों की अहम भूमिका है।
प्रो. पुष्पिता ने कहा कि विभिन्नता एवं मतभेदों के बावजूद हमारे देश में जो एकजुटता है, वह विदेशों में देखने को नहीं मिलती, क्योंकि अधिकांश गुणसूत्र भारतीय संस्कृति में ही मिलते हैं। उन्होंने कहा कि भाषा को लेकर हीन भावना नहीं होनी चाहिए क्योंकि स्पेन, डच, फ्रांस और जर्मनी आदि देशों के लोग अंग्रेजी न बोलकर अपनी भाषा में ही संवाद करते हैं। उन्होंने कहा कि विश्व में भारतीय संस्कृति का प्रभाव, स्वीकार्यता एवं महत्ता निरंतर बढ़ रही है और आने वाले समय में भारतीय संस्कृति वैश्विक संस्कृति बन जाएगी। उन्होंने कहा कि भारत की संस्कृति की ताकत बहुत विलक्षण है और पूरे विश्व में योग व ध्यान का महत्व बढ़ रहा है। कार्यक्रम की अध्यक्षता सह कुलपति प्रो. एमएच बेग तथा अतिथियों का स्वागत विभागाध्यक्ष प्रो. अब्दुल अलीम ने की। डीन प्रोफेसर मसूद अनवर अल्वी, प्रो. मैराज अहमद, साहित्यकार प्रेम कुमार, प्रो. आशिक अली, प्रो. शंभुनाथ, प्रो. वेदप्रकाश, प्रो. राजीव लोचननाथ शुक्ला, प्रो. अजय बिसारिया, शगुफ्ता नियाज, दीबा नियाजी आदि मौजूद थे।
भारतीय समाज और हिंदी उपन्यास का विमोचन
प्रो. पुष्पिता अवस्थी एवं सह कुलपति प्रो. एमएच बेग ने शोध छात्र अकरम हुसैन कादरी की पुस्तक ‘भारतीय समाज और हिंदी उपन्यास’ का विमोचन किया। कादरी ने इस पुस्तक को प्रो. पुष्पिता अवस्थी एवं प्रो. मेराज अहमद को समर्पित किया है।