हिंदू हृदय सम्राट। हिंदुत्व के नायक। राम मंदिर आंदोलन के नायक। सरीखी अनगिनत उपाधियों से नवाजे गए स्व. कल्याण सिंह के सियासी-सामाजिक जीवन पर गौर करें तो अनगिनत ऐसे किस्से हैं जिससे उनके कद का अंदाजा लगाया जा सकता है। कल्याण सिंह उस दौर में जनसंघ से जुड़े, जब कांग्रेस का दौर था। जनसंघ में राजनीति दुर्लभ माना जाता था। मगर पिछड़ी जाति में हिंदू छवि और सख्त निर्णय लेने वाले के रूप में उभरते नेता ने हार नहीं मानी। अतरौली सीट पर जीत दर्ज कर प्रदेश में जनसंघ के इकलौते विधायक का खिताब अपने नाम दर्ज किया और राम मंदिर आंदोलन के समय लिए अपने फैसले से उसी अतरौली को देश दुनिया में पहचान दिलाई। उनके समर्थक उनके गांव की मिट्टी तक अपने साथ ले गए।
गांव खुशहाल, देश खुशहाल और मेरा बूथ, दस यूथ का दिया नारा
कल्याण सिंह शुरुआत से ही एक नारा देते थे कि गांव खुशहाल तो देश खुशहाल। मेरा बूथ, दस यूथ। इस नारे के सहारे वे पार्टी को आगे बढ़ाने का काम करते थे। पार्टी के प्रति उनके समर्पण का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि बैठकों या रैलियों में वे उस समय साधन न होने से साइकिल तक से जाते थे। कल्याण सिंह अपने दोस्तों को हमेशा याद रखते थे।
संघर्ष भरे जीवन में रामलला के दर्शन की इच्छा रही अधूरी
कल्याण सिंह का जीवन हिंदुत्व व राम मंदिर के लिए संघर्ष भरा रहा। उन्होंने विवादित ढांचा गिराए जाने के समय कारसेवकों पर गोली चलवाने के बजाय मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। दो बार भाजपा से नाराजगियों के चलते दूरी बनाई। मगर उनकी भव्य मंदिर में रामलला के दर्शन की इच्छा अधूरी रह गई।
भाजपा को भी था उनकी ताकत का अंदाजा
युवा जीवन में जनसंघ और फिर भाजपा को एक पौधे के रूप में सींचने वाले कल्याण सिंह की ताकत का अंदाजा भाजपा को भी था। जब पहली बार उन्होंने भाजपा से दूरी बनाई, तब भाजपा को नुकसान हुआ। दूसरी बार दूरी बनाई, तब भी भाजपा को नुकसान हुआ। 2013 में मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रयास से कल्याण सिंह की पुन: भाजपा में वापसी हुई।
बाबूजी मेरे नायक हैं। उनकी राजनीतिक विरासत को संभालने का प्रयास कर रहा हूं। उनके अनुयायियों द्वारा जो प्यार व सम्मान हमें मिलता है, उसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। उनकी पुण्यतिथि पर आज हिंदू गौरव दिवस का मुख्य आयोजन लखनऊ में होने जा रहा है। जिसमें बड़ी संख्या में लोग शामिल होंगे। -राजवीर सिंह राजू, पूर्व सांसद व कल्याण सिंह पुत्र