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पूरे देश में फिर उड़ेगा हाथरस का रंग और गुलाल, लेकिन कारोबार पर कोरोना का साया

Thu, 18 Feb 2021 03:23 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, हाथरस
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गुलाल - फोटो : Wikipedia
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रस की नगरी हाथरस का गुलाल और रंग एक बार फिर होली पर देश भर में बिखरेगा। पिछले कई माह से यहां गुलाल और रंग की फैक्टरियों में लगातार काम चल रहा है। ऑर्डर के हिसाब से माल की आपूर्ति भेजी जा रही है। करीब छह से आठ हजार लोग यहां के दशकों पुराने इस उद्योग से जुड़े हैं। वैसे इस बार भी कारोबारियों द्वारा कोरोना के डर से कम माल तैयार किया जा रहा है।

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शहर में इस समय दर्जन भर से ज्यादा रंग और गुलाल की फैक्टरियां हैं। कुछ व्यापारी केवल पैकिंग के काम तक सीमित हैं। यह उद्योग करीब 90 साल पुराना है। जानकारों की मानें तो किसी समय देश भर में गुलाल केवल हाथरस में ही बनता था। अब हालांकि अन्य स्थानों पर भी गुलाल बनने लगा है। यहां के रंग-गुलाल की दूर-दूर तक मांग है। स्टार्च को रंग और अन्य रसायनों में मिलाकर गुलाल बनाया जाता है। 

यहां मुख्य रूप से गुलाबी, हरा, लाल, पीला, केसरिया रंग का गुलाल बनता है। इसके लिए कच्चा माल उत्तराखंड, मध्य प्रदेश और पंजाब आदि राज्यों से आता है। यहां हालांकि ऑरिजनल रंग का उत्पादन तो नहीं होता, लेकिन स्टार्च और डैक्सट्रीन पाउडर पर रंग का बेस मिलाकर इसे रंग जैसा बनाया जाता है, फिर उद्यमी इस रंग को अपना मार्का देकर बाजार में बेचते हैं।
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होली पर लगभग ज्यादातर स्थानों पर हाथरस के रंग की मांग होती है। फिल्म सिटी मुंबई के भी काफी बड़े दुकानदार यहां की फैक्टरियों से रंग-गुलाल मंगाते हैं और फिर यह गुलाल और रंग फिल्मी दुनिया में होली पर उड़ेला जाता है। प्रदेश के अन्य हिस्सों के अलावा पंजाब, राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, हरियाणा आदि प्रदेशों में रंग गुलाल जाता है। हालांकि इस बार कोरोना काल के चलते रंग और गुलाल के ऑर्डर कम मिले हैं। फैक्टरियों में भी पिछले वर्षों की अपेक्षा कम काम हो रहा है।  


समस्याओं से भी जूझ रहा उद्योग
सरकारी प्रोत्साहन के अभाव और समस्याओं के चलते हाथरस का गुलाल और रंग का उद्योग समस्याओं से भी जूझ रहा है। सबसे बड़ी समस्या तो टैक्स की है। इसके अलावा लेबर की समस्या से भी यह कारोबार जूझ रहा है। बिजली संकट से भी यहां के उद्योग धंधे पर असर पड़ रहा है। यह काम सीजनेवल है। दिवाली से यह काम शुरू हो जाता है और होली तक रहता है। उसी समय यहां आलू की खुदाई का काम शुरू होता है। इसके अलावा माल के परिवहन की समस्या भी इस कारोबार में बाधक बनी हुई है। परिवहन की सीधे व्यवस्था न होने की वजह से ट्रकों में चार-चार बार माल को चढ़ाना उतारना पड़ता है। 

कोरोना काल में भी यह उद्योग प्रभावित हुआ है। कोरोना के चलते इस बार 50 प्रतिशत रंग ही तैयार हो पाया है। पिछले साल कोरोना के चलते माल बिक नहीं पाया था। कई व्यापारियों ने भुगतान भी नहीं किया है। उद्यमियों को डर है कि कहीं रंगों पर प्रतिबंध न लग जाए और माल फंस न जाए। 
-विनोद कुमार मित्तल, रंग उद्यमी

इस बार कोराना का टीका आने से होली का सीजन अच्छा रहने की उम्मीद है। इस बार होली लेट भी है। मांग के अनुसार माल तैयार किया जा रहा है। होली देरी से होने के कारण इस बार सीजन अच्छा रहेगा। 
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-देवेंद्र गोयल, रंग उद्यमी
 

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