अपर आयुक्त (ग्रेड-1) अलीगढ़ जोन के निर्देश पर संयुक्त आयुक्त एसआईबी की निगरानी में यह अभियान चलाया गया। उपायुक्त एसआईबी के नेतृत्व में 30 से अधिक अधिकारियों की टीम ने भारी पुलिस बल के साथ 6 ठिकानों पर सर्च और सीजर की कार्यवाही की। टीम ने मौके से भारी मात्रा में दस्तावेज और डिजिटल रिकॉर्ड (हार्ड डिस्क, कंप्यूटर डेटा) अपने कब्जे में लिया है। विभागीय अधिकारियों के मुताबिक डाटा विश्लेषण में पाई गई कमियों के आधार पर यह इंटेलिजेंस-बेस्ड कार्यवाही की गई है। अभी रिकॉर्ड का विश्लेषण किया जा रहा है।
फर्म स्वामी को सुनवाई का अवसर देने के बाद ही कर अपवंचन का अंतिम निर्धारण किया जाएगा। अधिकारियों के मुताबिक कार्यवाही के दौरान व्यापारी और फैक्ट्री प्रबंधन द्वारा जांच में सहयोग किया गया। अधिकारियों का कहना है कि जब्त किए गए दस्तावेजों का मिलान स्टॉक और बैंक ट्रांजैक्शन से किया जा रहा है। जांच पूरी होने के बाद कर चोरी का यह आंकड़ा और बढ़ सकता है। एक ही परिसर में संचालित तीन अलग-अलग प्रतिष्ठानों के जरिए टैक्स बचाने के खेल का भी पर्दाफाश हुआ है।
पाठकों के लिए तकनीकी सवाल हो सकता है कि चूंकि मीट निर्यात पर जीएसटी की दर शून्य होती है, तो फिर कोई कंपनी 200 करोड़ की कर चोरी कैसे कर सकती है। इसके पीछे मुख्य रूप से आईटीसी का खेल और घरेलू बिक्री को छिपाना है। निर्यातकों को यह सुविधा मिलती है कि उन्होंने कच्चा माल, मशीनरी या सेवाएं खरीदते समय जो जीएसटी चुकाया है, उसका वे सरकार से रिफंड ले सकते हैं।
कंपनियां फर्जी फर्मों से फर्जी बिल बनवा लेती हैं कि उन्होंने करोड़ों का सामान खरीदा है, जबकि वास्तव में कोई खरीदारी नहीं हुई होती। इसके अलावा मीट फैक्ट्रियां केवल निर्यात नहीं करतीं, उनके कई सह-उत्पाद (बाइ प्रोडक्ट) जैसे चर्बी, खाल , हड्डियां और कुछ किस्म का मीट घरेलू बाजार में भी बिकता है। इस माल को कैश में बेच दिया जाता है और उसे रिकॉर्ड में नहीं दिखाया जाता। इस बिक्री पर जीएसटी लगता है, इसलिए इसे छिपाकर सीधे टैक्स की चोरी की जाती है।