150 किमी में लगे 110 कैमरों की फुटेज खंगाली
ऑपरेशन स्माइल के तहत एसएसपी ने पांच टीमों का गठन किया गया। थाना टीम, सर्विलांस और क्राइम इन्वेस्टिगेशन विंग देहात ने संदिग्ध नंबरों और सोशल मीडिया वेबसाइट्स का टेक्निकल एनालिसिस किया। अलीगढ़, दिल्ली और मथुरा/वृंदावन के करीब 150 किलोमीटर के दायरे में आईसीसीसी सहित 110 से अधिक कैमरों की फुटेज खंगाली गई। रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड, होटल और मेलों में डॉग स्क्वायड की मदद से चेकिंग अभियान चलाया। लड़कियों की तस्वीरें रेंज और सीमावर्ती सभी जिलों के पुलिस व्हाट्सएप ग्रुप में शेयर की गईं।
परिजनों को देख बिलखकर लिपटीं, बोलीं अब कभी कहीं नहीं जाएंगी
चार लड़कियां माता-पिता को देखते ही बिलखते हुए उनसे लिपट गईं और बोलीं अब हम कभी भी और कहीं नहीं जाएंगी। एक लड़की की मां ने कहा अगर तुझे कपड़े ही चाहिए थे तो हमें बताया होता हम खूब कपड़े दिलवाते। सभी लड़कियों के माता-पिता छोटे किसान हैं। सभी की आर्थिक स्थिति साधारण है।
डरा रहे आंकड़े, 165 दिन में घर 720 बच्चे हुए लापता
जिले में बीते महज साढ़े पांच महीनों (लगभग 165 दिन) के भीतर 720 नाबालिग बच्चे या तो घर से भाग गए या संदिग्ध परिस्थितियों में लापता हो गए। यानी हर दिन औसतन चार से ज्यादा बच्चे घर छोड़ रहे हैं। यह आंकड़ा डराने वाला है, इनमें से 590 को पुलिस ने सुरक्षित खोज निकाला है, बाकी की तलाश चल रही है।
इस आंकड़े का खुलासा खुद वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक ने किया है। उन्होंने बताया कि पिछले साल अक्टूबर में अलीगढ़ में ही तैनात एक सब-इंस्पेक्टर का इकलौता बेटा सिर्फ इसलिए घर से नाराज होकर भाग गया, क्योंकि घरवालों ने उसे स्मार्टफोन दिलाने से मना कर दिया था। वह लड़का पूरे छह महीने तक घरवालों को बिना बताए दिल्ली में रहा। अधिकांश मामलों में नाबालिग लड़कियों को बहला-फुसलाकर भगाया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ नाबालिग लड़के छोटी-छोटी बातों पर माता-पिता से रूठकर या झगड़कर घर छोड़ रहे हैं।
मानसिक उथल-पुथल के बीच उठाते हैं कदम
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान विभाग के अध्यक्ष प्रो. शाह आलम कहते हैं कि बच्चे गहरी मानसिक उथल-पुथल में ऐसे कदम उठाते हैं। किशोर उम्र में बच्चों का दिमाग पूरी तरह विकसित नहीं होता है। माता-पिता की डांट, जैसे मोबाइल छीनना या पढ़ाई के लिए टोकना, बच्चों को गुस्से में घर छोड़ने पर मजबूर करती है। उन्हें लगता है कि भाग जाना ही उस वक्त का समाधान है। बच्चे सोशल मीडिया, यूट्यूब और रील्स की आभासी दुनिया में खोए रहते हैं। उन्हें घर का माहौल उबाऊ या बंदिशों वाला लगता है।