आनंद एग्रोकेम गोपी लधुआ चीनी मिल से जुडे़ गन्ना किसानों के भुगतान के लिए जो रकम सरकारी कागजों में दिखाई गई असल में वह किसानों तक पहुंची या नहीं..? अब इसकी जांच शुरू हो गई है।
वर्ष 2013 से तकरीबन पांच हजार किसान ब्याज सहित अपने 37 करोड़ रुपये के बकाया भुगतान के लिए जिला प्रशासन, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक चक्कर लगा रहे हैं, लेकिन उन्हें भुगतान नहीं मिल रहा है। नया खुलासा ये हुआ कि जो भुगतान बैंकों के माध्यम से किया गया बताया जा रहा है उसकी बैंक एडवायजरी संदेह के घेरे में है। यही नहीं इसी एडवाजयरी को लगा कर मिल मालिकों को अदालत से राहत मिली है।
ऐसे में अगर गलत एडवायजरी लगाई गई है तो ये और बड़ा अपराध साबित होगा। ये एडवायजरी नियोली कासगंज के माध्यम से बनाई गई है, जिसमें दो करोड़ 93 लाख रुपये के भुगतान का होना दर्शाया गया है। जिला गन्ना अधिकारी सुनील कुमार ने बताया कि इस गंभीर प्रकरण में जांच शुरू हो गई है, आला अधिकारी इसकी जांच करेंगे।
गौर हो कि इस प्रकरण की जांच डिप्टी केन कमिश्नर मेरठ हरपाल सिंह, जिला गन्ना अधिकारी अमरोहा, सचिव सहकारी गन्ना विकास समिति लिमिटेड बागपत की तीन सदस्यीय समिति को सौंपी गई है। डिप्टी केन कमिश्नर मेरठ ने बताया कि लखनऊ से फोन पर इसकी सूचना दी गई है। सोमवार 8 अगस्त को वह अलीगढ़ पहुंच सकते हैं, लेकिन अभी तक लिखित आदेश नहीं मिले हैं।
जनहित मानवाधिकार एसोसिएशन के अध्यक्ष विनोद पांडेय ने इस संबंध में गन्ना विकास एवं चीनी उद्योग उत्तर प्रदेश के आयुक्त विपिन कुमार द्विवेदी को लिखित शिकायत भेजी थी कि मिल के मालिकों ने सरकारी विभागों के अफसराें से मिलीभगत कर फर्जी एडवायजरी बनवाई है, जबकि हकीकत में किसानों को भुगतान नहीं किया गया है। इसकी जांच कराई जाए।
पांडेय ने ये भी कहा है कि मिल के सभी रिकार्ड जिस सर्वर में हैं उसको भी गायब कर दिया गया है। जिला गन्ना अधिकारी भी मानते हैं कि सर्वर के संबंध में कई बार बताने के बाद भी उचित कार्रवाई नहीं हो सकी है सूचना के अनुसार सर्वर के मथुरा में होने की संभावना है।