प्रसिद्ध शायर डॉ. अमर नदीम (65) नहीं रहे। वह वायरल बुखार से पीड़ित थे। सांस लेने में काफी दिक्कत महसूस कर रहे थे, जिन्हें बुधवार रात इलाज के लिए दिल्ली ले जाया रहा था, जहां रास्ते में दम तोड़ दिया।
महानगर के ज्ञान सरोवर (सरस्वती विहार) में डॉ. अमर अपनी पत्नी व पूर्व बैंक कर्मी अर्चना उर्फ मीता के साथ रहते थे। डॉ. अमर के दो गजल संग्रह ‘मैं न कहता था’, ‘आंखों में कल सपना है’, प्रकाशित हो चुके हैं। सुरेंद्र भूटानी की अंग्रेजी कविताओं का अनुवाद ‘एक दोस्त के लिए’, लैंग्स्टन ह्यूज की अंग्रेजी कविताओं का अनुवाद ‘स्थगित स्वप्न’ व जेल्दा काहन कोट्स द्वारा लिखित कार्ल मॉर्क्स की अंग्रेजी जीवनी का अनुवाद ‘कार्ल मार्क्स जीवन और शिक्षाएं’ आदि पुस्तकें भी उनके खाते में हैं।
उन्होंने मार्क्सवाद पर पीएचडी की थी। डॉ. नदीम भी बैंक में थे। एक हादसे के बाद 2004 में उन्होंने नौकरी से वीआरएस ले लिया था। इसके बाद वह साहित्य से जुड़ गए। छात्र जीवन से कम्युनिस्ट विचारधारा से प्रभावित होकर पार्टी की सदस्यता भी ली थी। डॉ. अमर को इसी 20 अगस्त को डीएस कॉलेज के हिंदी विभाग के सभागार में काव्यश्री सम्मान से नवाजा जाना था। गुरुवार को उनके परिजनों ने उनका शव अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के जेएन मेडिकल कॉलेज को सौंप दिया। डॉ. अमर ने कॉलेज में शोध कार्य के लिए देहदान करने की औपचारिकताएं पूरी कर दी थीं।
डॉ. अमर के निधन पर शोकः भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के जिला कमेटी के पूर्व सदस्य, कवि व गजलकार डॉ. अमर नदीम के आकस्मिक निधन पर पार्टी का झंडा झुका दिया गया है। पार्थिव शरीर पर पार्टी का लाल झंडा डाला गया। उनके घर पर पहुंचकर पार्टी के कार्यकर्ताओं ने संवेदना व्यक्त की। इस अवसर पर नरेंद्र पचौरी, सचिन जैन, योगेश्वर सिंह, महेश चौहान, चुन्नी लाल वर्मा, उदयवीर सिंह, जिला सचिव इदरीश मोहम्मद, बृज किशोर शर्मा, आलोक शर्मा आदि मौजूद रहे।
बेटे की शादी देखने का रह गया सपना अधूरा
कवि डॉ. अमर नदीम अपनी पत्नी अर्चना के साथ रहते थे। इनकी इकलौती संतान पुष्किन हैं, जिसने हाल ही में एक बड़ी कंपनी की नौकरी छोड़कर खुद का बिजनेस शुरू कर दिया है। पुष्किन ने एएमयू के बीटेक (इलेक्ट्रिकल) में डिग्री लेने के बाद ऑक्सफोर्ड से एमबीए की पढ़ाई पूरी की। पुष्किन का विवाह कोरियाई मूल की लड़की से तय है। डॉ. अमर के एक साथी ने बताया कि बेटे का जनवरी में विवाह होना है। मगर, क्रूर काल ने उनके साथी डॉ. अमर को छीन लिया। एक अन्य साथी इदरीश मोहम्मद ने बताया कि डॉ. अमर वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखते थे। वह ग्रामीण बैंक में सेवाएं दे चुके थे। उन्होंने एक बेहतरीन दोस्त खो दिया है।
कलम जिंदा है...
बाग़बां बन के सय्याद आने लगे;
बुलबुलों को मुहाजिर बताने लगे!
भाईचारा! मुहब्बत! अमन! दोस्ती!
भेड़ियों के ये पैग़ाम आने लगे!
आपसे तो तक़ल्लुफ़ का रिश्ता न था
आप भी दुनियादारी निभाने लगे!
दर्द वो क्या जो गुमसुम सा बैठा रहे
दर्द तो वो है जो गुनगुनाने लगे!
एक लमहा था; आया,गुज़र भी गयाो
पर उसे भूलने में ज़माने लगे।
- अमर नदीम
( फेसबुक वाल से)
डॉ. अमर की अंतिम यात्रा में शामिल
डॉ. अमर नदीम ने मेडिकल कॉलेज में छात्रों के अध्ययन के लिए देह दान करने की इच्छा व्यक्त की थी। उनके निधन के बाद परिजन उनकी इच्छा के अनुरूप एंबुलेंस से शव मेडिकल कॉलेज ले गए। इस अंतिम यात्रा में आलोक शर्मा, अजीत सक्सेना, अभय जौहरी, एएमयू के डीएफओ सैयद सुल्तान सलाहुद्दीन, यासमीन जलाल बेग आदि शामिल थे।
अमर नदीम की वाम प्रतिबद्धता जीवन पर्यन्त अकुण्ठ रही है। कुछ वर्षों पहले एक सड़क दुर्घटना में गम्भीर रूप से घायल होने के बाद , चलने-फिरने तक की असर्मथता के बावजूद साथी अमर नदीम के अध्ययन और सृजन का अनवरत सिलसिला कभी रुका नहीं। बिस्तर पर लेटे-लेटे उन्होंने कार्ल मार्क्स की जेल्डा कोट्स लिखित सुप्रसिद्ध जीवनी का अनुवाद कर डाला था।इन दिनों वे परिकल्पना प्रकाशन के लिए मार्क्स-एंगेल्स के बारे में उनके समकालीनों के संस्मरणों के एक दुर्लभ्ा संकलन के अनुवाद में व्यस्त थे। हम साथी अमर नदीम के इस असामयिक आकस्मिक निधन की खबर से स्तब्ध और शोक-संतप्त हैं। - कात्यायनी
कुछ कह सकने की स्थिति में नही हूँ ... सिवाय शून्य शून्य और शून्य.. गलत बात है अमर जी ये तो कोई बात नही हुई आपकी। - नीता पोरवाल