इस परियोजना की खास बात यह है कि इसमें केवल धान की पराली ही शामिल नहीं है। बिजली और बायो गैस उत्पादन के लिए गन्ने की खोई (अवशेष) और सरसों के डंठल का भी बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जाएगा। पराली को पेलेट्स बनाकर कोयले के साथ इस्तेमाल किया जाएगा। पराली और फसल के अवशेषों से सीएनजी तैयार होगी। इससे खेतों में आग लगाने की घटनाओं में भारी कमी आने की उम्मीद है।
कृषि विभाग के अधिकारियों के अनुसार, जिले में पराली और अन्य फसल अवशेषों के कलेक्शन की व्यवस्था की जा रही है, ताकि किसानों को इन्हें जलाने की जरूरत न पड़े। इससे एक ओर जहां मिट्टी की उर्वरक शक्ति बनी रहेगी, वहीं दूसरी ओर किसानों को उनके अवशेषों का उचित मूल्य मिल सकेगा।