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एक युद्ध पटाखों के विरुद्धः पटाखों का न करें इस्तेमाल, बल्कि बैलून क्रैकर से करें दो गुना धमाल

Wed, 11 Nov 2020 01:34 AM IST
अलीगढ़ ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, अलीगढ़
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प्रीति शर्मा - फोटो : amar ujala
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अमर उजाला द्वारा चलाए जा रहे अभियान ‘एक युद्ध पटाखों के विरुद्ध ’ में पटाखों का इस्तेमाल न करने के साथ ही पटाखों के विकल्प के बारे में भी लोगों को बताया गया। मंगलवार को अमर उजाला द्वारा आयोजित वेबिनार में अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़ी जागरूक महिलाओं ने हिस्सा लिया। इसमें यह भी बताया गया कि पटाखों का एक विकल्प बैलून क्रैकर और इस पर आधारित आतिशबाजी भी हो सकती है। यह पर्यावरण के लिए बिल्कुल नुकसानदायक नहीं है। इस तरह हम पहले से ही जहरीली हो चुकी हवा को सांस लेने लायक बनाए रख सकते हैं। प्रदूषण एक बड़ी समस्या है।
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पटाखों पर प्रतिबंध लगने से इससे जुड़ी पूरी इंडस्ट्री को नुकसान भी पहुंचता है, लेकिन यह बात भी सही है कि जीवन की कीमत पर कोई भी समझौता नहीं किया जा सकता। जब भी हम पटाखों पर प्रतिबंध लगाने की बात करते हैं तो एक बार बच्चों के मासूम चेहरे की तरफ देखें। उनके चेहरों पर अनायास ही मायूसी छा जाती है, इसलिए हमें नए तरीके खोजने होंगे। इसका एक विकल्प बैलून क्रैकर और इस पर आधारित एक्सप्लोसिव हो सकते हैं। इन्हीं को लाने की कोशिश की जा रही है। इससे बच्चों को आवाज और धमाके का रोमांच दोनों ही मिलेंगे।
- सारिका सक्सेना, डायरेक्टर एंड एचआर हेडए दीप एक्सप्लोसिव इक्विपमेंट प्राइवेट लिमिटेड।

यह सही है कि इस समय पर्यावरण को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंच रहा है। ऐसे में अगर आतिशबाजी का प्रयोग किया जाए तो यह नुकसान और भी बढ़ जाता है। महामारी के समय किसी भी प्रकार का जोखिम नहीं लिया जा सकता। बच्चों को पटाखों के लिए मना करना एक मुश्किल भरा काम है, लेकिन बच्चों को समझाना होगा। उनको भरोसे में लेना होगा। उन्हें यह बताना होगा कि ऐसा करना उनके ही हित में है। उन्हें प्रदूषण के बढ़ते हुए खतरों के विषय में जागरूक करना होगा। इसके बाद हम पूरी उम्मीद करते हैं कि बच्चे इस बात को समझ जाएंगे।
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-नीलम वार्ष्णेय, गृहणी।

दीपावली को हम बिना पटाखों के भी मना सकते हैं। दीपावली पर हम दीपों से रोशनी कर सकते हैं। मूल रूप से दीपावली प्रकाश का त्योहार है। जब पहले से ही सांस लेने लायक हवा न बची हो, तो ऐसे में उसको और बर्बाद कर देना समझदारी नहीं होगी। यह बात सही है कि आतिशबाजी का इस्तेमाल न होने से बच्चे थोड़ा मायूस होंगे, लेकिन उन्हें अन्य प्रकार से खुशियां दी जा सकती हैं। दीपावली को जरूरतमंद बच्चों के साथ मिलकर सेलिब्रेट किया जा सकता है। जरूरतमंद बच्चों को उपहार बांटे जा सकते हैं। इसके अलावा बच्चों को आतिशबाजी से होने वाले नुकसान भी बताए जा सकते हैं।
- राधा चौहान, संस्थापक अनुभूति फाउंडेशन।

दीपावली रोशनी और खुशियों का त्योहार है। यह भी सही बात है कि पटाखों से प्रदूषण बहुत अधिक हो जाता है। हालांकि बिना पटाखों के भी वातावरण में प्रदूषण बहुत अधिक हो जाता है, लेकिन दीपावली पर आतिशबाजी के कारण वातावरण में धुंध और स्मॉग बढ़ने से समस्या अधिक हो जाती है। इस वर्ष कोरोना वायरस महामारी के चलते यह जरूरी है कि हमें इस पर रोक लगानी चाहिए। क्योंकि इस महामारी का संबंध सबसे ज्यादा फेफड़ों से ही होता है। खतरे को देखते हुए कुछ राज्यों ने रोक लगा भी दी है, लेकिन इसके लिए लोगों को स्वयं भी आगे आना चाहिए।
-सपना सिंह, एयरोनॉटिकल इंजीनियरए स्पाइसजेट।

दीपावली पर घर और आसपास की जगहों को प्रकाशमान करें। यही त्योहार की सच्ची खुशी है। पटाखे जरूरी नहीं है। दीयों से भी प्रकाश किया जा सकता है। इस वर्ष आतिशबाजी के प्रयोग से बचना ज्यादा हितकर होगा। यह एक नई पहल होगी। इस नई पहल के लिए अवश्य कुछ न कुछ करना होगा। इसकी शुरुआत केवल घर से ही नहीं, बल्कि अपने परिचित, अपने आस-पड़ोस, अपने गली-मोहल्ले, कॉलोनी से करनी होगी। इसके अलावा आतिशबाजी के माध्यम से जो लोग जानवरों को परेशान करते हैं, इस चलन को भी रोकना होगा।
-प्रीत शर्मा, समाजसेवी और पशु अधिकार कार्यकर्ता।

धारणा के विपरीत सही बात यह है कि हम बिना पटाखों के भी दीपावली को हर्ष और उल्लास के साथ मना सकते हैं। मैं खुद पिछले 3 वर्ष से बिना पटाखों के ही दीपावली मना रही हूं। दीपावली पर स्लम एरिया के बच्चों के साथ दिए जलाना। उनको मिठाई बांटना। उनको उपहार देना, ऐसे काम हैं, जिनसे बहुत ज्यादा खुशी हासिल की जा सकती है। ऐसे इलाकों में जाकर रंगोली बनाना। नृत्य प्रतियोगिताएं आयोजित करना ज्यादा सार्थक साबित होता है। इसके अलावा मैंने संकल्प लिया है कि स्वयं और अपने परिचित सभी लोगों से अपील करूंगी इस वर्ष आतिशबाजी रहित दीपावली मनाएं।
-लवली गुप्ता, शारीरिक शिक्षकए सदस्य रोबिन हुड आर्मी।

कोई भी फेस्टिवल हो उसमें सबसे अहम बात होती है खुशियां। उनकी कई मित्र हैं जिनके घरों में दीपावली हर्ष और उल्लास के साथ मनाई जाती है। वह लोग स्वयं यह महसूस करते हैं कि आतिशबाजी के साथ कहीं न कहीं जोखिम जुड़ा हुआ है। इसके अलावा वह लोग जो पहले से ही सांस से संबंधित बीमारियों से परेशान हैं, जिन्हें साइनस या अस्थमा की समस्या है। उनके लिए आतिशबाजी का प्रयोग बहुत ही तकलीफ देह होता है। इसलिए यह आपको तय करना है कि त्योहार के अवसर पर लोगों को खुशियां देनी है या उनकी तकलीफों को बढ़ाना है।
-नमरा खान, ब्लिस इवेंट मैनेजमेंट।

सपना स्वदेश।- फोटो : CITY OFFICE

 

नमरा खान- फोटो : CITY OFFICE

 

राधा चौहान- फोटो : CITY OFFICE

 

लवली गुप्ता- फोटो : CITY OFFICE

 

लवली गुप्ता। - फोटो : CITY OFFICE

 

सपना सिंह- फोटो : CITY OFFICE

 

सारिका सक्सेना- फोटो : CITY OFFICE

 

नीलम वार्ष्णेय- फोटो : CITY OFFICE

 

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