औटा के पूर्व अध्यक्ष डा रक्षपाल सिंह ने कहा कि यूपी बोर्ड परीक्षा 2020 में 8 लाख परीक्षार्थियों के हिंदी विषय में फेल होने चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि इस पर कई विद्वानों ने अपनी राय दी है, लेकिन इन सभी लोगों को एनुअल स्टेटस ऑफ एजूकेशन रिपोर्टस 2011, 2012, 2013 को पढ़ना चाहिए था, जिसमें बेसिक शिक्षा व्यवस्था की हकीकत बयान की गई है। रिपोर्ट में बताया गया कि कक्षा 3 के 75 प्रतिशत, कक्षा 5 के 50 प्रतिशत एवं कक्षा 8 के 25 प्रतिशत विद्यार्थी कक्षा 2 की हिंदी पुस्तक नहीं पढ़ पाते। ऐसे विद्यार्थी हाईस्कूल या इंटर में हिंदी में कैसे पास हो सकते हैं। उन्होंने हिंदी की उक्त दयनीय स्थिति के लिए केवल लोकलुभावन नीतियों को ही जिम्मेदार माना। मसलन, शिक्षा अधिकार कानून 2009 के तहत परीक्षा पुस्तिका में कुछ भी न लिखने वाले विद्यार्थी को भी फेल नहीं करने की व्यवस्था है।
डा. रक्षपाल ने कहा कि जब विद्यार्थियों पर फेल होने का थोड़ा दबाव रहता है तो वह गंभीरता से पढ़ते हैं। अब ऐसा नहीं है, इसीलिए विद्यार्थियों ने हिंदी जैसे विषय को पढ़ना बंद कर दिया। यदि सरकार हिंदी भाषा का भला करना चाहती है तो उसे अविलंब शिक्षा अधिकार कानून 2009 को समाप्त कर प्राथमिक स्तर पर हिंदी व गणित पाठ्यक्रमों का सम्यक ज्ञान कराया जाना जरूरी करना होगा। सरकार को सीबीएसई स्कूलों की भांति प्राथमिक कक्षाओं की नकलविहीन परीक्षा एवं ईमानदार मूल्यांकन सुनिश्चित कराना होगा।