तय मानकों से अधिक ध्वनि के कारण कान के भीतर की संवेदनशील कोशिकाएं क्षतिग्रस्त होने लगती हैं। लंबे समय तक ऐसा होने पर कान में सीटी बजने (टिनिटस), सूजन, दोहरी आवाज सुनाई देने और माइग्रेन की शिकायत हो जाती है।
ईयरबड्स-हेडफोन लगाकर घंटों रील्स देखने और तेज आवाज में गाने सुनने का शौक युवाओं के कानों पर भारी पड़ रहा है। मनोरंजन का यह शोर धीरे-धीरे सुनने की क्षमता को कमजोर करने के साथ सिरदर्द, कानों में भारीपन और चिड़चिड़ापन जैसी परेशानियां बढ़ा रहा है। जिला अस्पताल की ईएनटी ओपीडी में आने वाले मरीजों में करीब 15 से 20 फीसदी युवा ऐसे हैं, जो इस समस्या से पीडि़त हैं।
विज्ञापन
100 से 110 डेसिबल की आवाज खतरनाक
ईएनटी सर्जन डॉ. केके शर्मा ने बताया कि मानव कान के लिए 40 से 60 डेसिबल तक की आवाज ही सुरक्षित मानी जाती है। हालांकि, बाहरी वातावरण में वाहनों, डीजे और निर्माण कार्यों से औसतन 60 से 80 डेसिबल का शोर पहले से मौजूद रहता है। इसके बावजूद अधिकांश युवा 100 से 110 डेसिबल की तेज आवाज में गाने सुनते हैं और मोबाइल पर रील्स देखते हैं। ओपीडी में आने वाले मरीजों में करीब 50 फीसदी 20 से 30 वर्ष की उम्र के हैं।
याद्दाश्त और नींद पर भी पड़ रहा असर
ईएनटी विशेषज्ञ डॉ. रामकिशन ने बताया कि तय मानकों से अधिक ध्वनि के कारण कान के भीतर की संवेदनशील कोशिकाएं क्षतिग्रस्त होने लगती हैं। लंबे समय तक ऐसा होने पर कान में सीटी बजने (टिनिटस), सूजन, दोहरी आवाज सुनाई देने और माइग्रेन की शिकायत हो जाती है। छोटे बच्चों में ईयरफोन की लत से उनकी याद्दाश्त और समझने की क्षमता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। उन्होंने बताया कि सप्ताह में दो से तीन मामले ऐसे आ जाते हैं।
विज्ञापन
डॉक्टरों की सलाह
सुरक्षित ध्वनि सीमा : कानों को सुरक्षित रखने के लिए आवाज का स्तर हमेशा 60 डेसिबल से नीचे रखें।
जिम और टहलते समय परहेज : सुबह की सैर (मॉक) या जिम में वर्कआउट के दौरान हेडफोन या ईयरबड्स का इस्तेमाल करने से बचें।
समय सीमा तय करें : लगातार कई घंटों तक ईयरफोन का इस्तेमाल न करें, बीच-बीच में कानों को आराम दें।