हर पांच वर्ष बाद चुनाव आते हैं, प्रचारों को दौर चलता है, किसानों की भीड़ जुटती है, वे टकटकी आंखों से प्रत्याशियों को देखते हैं। मन में उठी टीस पर उनके वायदों का मरहम लगाकर घर लौटते हैं। मतदान के दिन आस और उम्मीद के साथ अपनी मनपंसद सरकार चुनते हैं। मगर, पांच वर्ष बाद हाथ लगती है निराशा।
किसानों की दुर्दशा की यह कहानी किसी एक चुनाव की नहीं, बल्कि हर बार की है। सरकार से लेकर लोकल जनप्रतिनिधि जुमलों में दुरुस्त रहते हैं और अलीगढ़ जनपद के किसान अपनी दुर्दशा पर रोते हैं। गेहूं किसानों का भी हाल कुछ अच्छा नहीं है। उनके लिए न तो सरकार सही समर्थन मूल्य तय कर पाती और न ही प्रशासन तमाम वायदों के बाद भी गेहूं क्रय केंद्रों को बिचौलियों की पहुंच से दूर रख पाता है।
आलम यह है कि किसान बर्बादी के कगार पर हैं। 2014 लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा प्रत्याशी ने जनपद में सरकारी प्रोसेसिंग यूनिट स्थापित कराने का वायदा किया था। मगर, पांच साल बाद भी किसान अच्छी पैदावार के बाद भी खपत न होने के चलते आलू को सड़कों पर उतरकर बेचने या फिर फेंकने को मजबूर होते हैं। इधर, खेती में प्रयोग होने वाले रसायनों से लेकर उपकरणों तक के दाम आसमान को छू रहे हैं। किसान जितनी लागत लगाकर मेहनत कर फसल उगता है, उसको देखते हुए आमदनी न के बराबर है।
लागत बढ़ी, आमदनी नहीं
सरकार किसानों की आय बढ़ाने की बात करती है। मगर, खेती से जुड़ी वस्तुओं के दाम बढ़ाकर किसानों की उम्मीदों पर झटका दे देती है। पिछले पांच साल में डीएपी, जिंक, पोटाश से लेकर कृषि उपकरणों के दाम तेजी से बढ़े हैं। इधर, किसानों को बिजली और डीजल के दाम बढ़ने के कारण भी किसान परेशान है।
गेहूं क्रय केंद्रों पर बिचौलियों का जाल
गेहूं के किसानों का भी दर्द आलू किसान से कम नहीं है। कुदरत के कहर से पार पाकर जब क्रय केंद्रों पर गेहूं को बेचने पहुंचता है तो बिचौलियों का जाल उसने फांसने में जुट जाता है। तीन-तीन दिन तक केंद्रों पर खुले आसमान के नीचे पड़े रहते हैं। सरकारों द्वारा तय सरकारी खरीद के दामों को लेेने के लिए भी बिचौलियों के चक्कर काटने पड़ते हैं। इसके कारण पिछले कई सालों से किसान अपनी फसल को सीधे मंडियों में बेचने को मजबूर हैं।
आलू की पैदावार बंपर, खपत के इंतजाम नहीं
जनपद के किसानों ने 2016-17 में आलू की बंपर पैदावार की। मगर, पंजाब का आलू पहले से बाजार में आने के कारण अलीगढ़ के किसानों को नुकसान झेलना पड़ा। हाल यह रहा कि अधिकांश किसानों ने आलू को डंप कर दिया। अब 2019 में भी एक बार फिर वहीं कहानी बनती दिख रही है। 27500 हेक्टेयर में आलू का 7,56250 मीट्रिक टन उत्पादन होने की आशंका है। इसमें से 70 प्रतिशत की खुदाई अभी हुई है। इतने में ही कोल्ड स्टोरेज फुल हो गए हैं।
इधर, दिल्ली सहित हरियाणा की मंडियों में पंजाब का आलू आने के कारण यहां के आलू की मांग नहीं है। इससे किसानों के माथे पर आलू की खपत को लेकर पसीना आ गया है। किसानों की माने तो इस समस्या का हल कोल्ड स्टोरेज और प्रोसेसिंग यूनिट है। जनपद में कोल्ड स्टोरेेज मालिकों की मनमानी और भाड़े पर प्रशासन को लगाम लगाना चाहिए। आलू किसानों का भला करने के लिए पूर्व में किए वायदे के अनुसार प्रोसेसिंग यूनिट की स्थापना हो।