शिक्षा के शहर में पढ़ाई का तरीका बदल रहा है। किताबों से दूरी, मोबाइल पर बढ़ती निर्भरता और सस्ती फोटोकॉपी का फैलता नेटवर्क शिक्षा की नई हकीकत बता रहे हैं। विश्व पुस्तक एवं कॉपीराइट दिवस की पूर्व संध्या पर अमर उजाला ने जब शहर में पढ़ने की आदत, लाइब्रेरी की स्थिति और कॉपीराइट कानून के पालन की पड़ताल की।
शहर अब मोबाइल स्क्रीन की चमक में सिमटता नजर आ रहा है। युवा अब किताबों के पन्ने पलटने के बजाय स्क्रीन स्क्रॉल कर रहा है। हालांकि, एएमयू की मौलाना आजाद लाइब्रेरी में अब भी विद्यार्थियों के हाथों में किताबें नजर आ रही हैं। दरअसल, यूनेस्को द्वारा हर साल 23 अप्रैल को विश्व पुस्तक एवं कॉपीराइट दिवस मनाया जाता है जिसका उद्देश्य पढ़ने, प्रकाशन और कॉपीराइट के प्रति जागरूकता बढ़ाना है।
यह दिन विलियम शेक्सपियर, मिगुएल डे सर्वेंट्स और इंका गार्सिलासो डे ला वेगा लेखकों की पुण्यतिथि (23 अप्रैल 1616) को याद करते हुए वर्ष 1995 से ज्ञान और साक्षरता को बढ़ावा देने का प्रतीक माना गया है।किताब बनाम रील्स : शहर में पढ़ने की पारंपरिक आदत कमजोर पड़ती दिख रही है।
किताबों की दुकानों पर पहले जैसी भीड़ अब नहीं दिखती। नियमित पाठकों की संख्या सीमित रह गई है और अधिकतर छात्र परीक्षा के समय ही किताबों का सहारा लेते हैं। इसके उलट, युवा घंटों मोबाइल पर रील्स और सोशल मीडिया में व्यस्त हैं। खाली समय में किताब पढ़ने के बजाय स्क्रीन स्क्रॉल करना नई आदत बन गई है। सवाल उठ रहा है कि क्या अलीगढ़ में पढ़ने की संस्कृति धीरे-धीरे खत्म हो रही है या सिर्फ उसका रूप बदल रहा है?