जीत प्रोजेक्ट बंद होने से क्षय (टीबी) रोगियों को चिह्नित करने में क्षय रोग नियंत्रण विभाग के समक्ष व्यवधान उत्पन्न हो रहा है। जनवरी से अब तक महज 1773 टीबी रोगी जिले में चिह्नित किए जा सके हैं। प्राइवेट चिकित्सक टीबी के लक्षण वाले मरीजों की सूचना क्षय रोग नियंत्रण विभाग को समय पर नहीं दे रहे हैं।
केंद्र सरकार ने 2025 तक टीबी को जड़ से खत्म करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। जीत प्रोजेक्ट से टीबी रोगियों के चिह्नीकरण का काम शुरू हुआ था। इसके तहत ऐसे लोगों की जांच की जानी है जो सरकारी अस्पताल में न जांच करवा रहे हैं और न इलाज। इस प्रोजेक्ट में निजी डॉक्टरों को सेक्टर में बांटा गया था। जीत प्रोजेक्ट टीम के सदस्य प्राइवेट डॉक्टरों से संपर्क कर उनके यहां इलाज करा रहे टीबी मरीजों का डाटा एकत्र करते थे। ऐसे मरीजों को नि:शुल्क इलाज के लिए सरकारी अस्पतालों में भेजने के लिए निजी डॉक्टरों को प्रेरित करते थे। जानकारी छिपाने पर निजी डॉक्टरों पर कार्रवाई का भी प्राविधान है।
जीत प्रोजेक्ट में 25 लोग जुड़े थे, जो निजी डॉक्टरों से डाटा एकत्र कर विभागीय साइट पर अपलोड करते थे। 31 दिसंबर 2021 को जीत प्रोजेक्ट बंद कर दिया गया है। जिला क्षय रोग अधिकारी डॉ. अनुपम भास्कर कहते हैं कि निजी डॉक्टर टीबी मरीजों की सूचना देने के लिए अपने यहां कर्मचारी नहीं रखते, जबकि निजी डॉक्टरों को प्रति मरीज एक हजार रुपये मिलते हैं। निजी डॉक्टर अपने यहां इस काम के लिए कर्मचारी लगा दें तो समस्या का समाधान संभव है। वर्तमान में विभागीय कर्मियों से डाटा एकत्र कराया जा रहा है। वहीं टीबी मरीजों को हर माह पोषण राशि व छह माह से चौबीस माह तक उपचार चलता है।
दो महीने में सिर्फ 1773 रोगी चिन्हित
इस वर्ष के पहले दो माह में 1773 रोगी चिह्नित किए गए हैं। सरकारी अस्पतालों में 1191 व प्राइवेट अस्पतालों में 582 रोगी चिह्नित किए गए हैं। प्राइवेट अस्पतालों से टीबी मरीजों की सूचना न मिलने पर फरवरी माह में 19 निजी डॉक्टर, अस्पताल, जांच केंद्र एवं लैब को नोटिस दिया गया है। इनमें कुछ के स्पष्टीकरण आ गए हैं। शेष लोगों को रिमाइंडर भेजा जा रहा है।
पिछले वर्ष लक्ष्य से काफी पीछे रह गया था जनपद
वर्ष 2021 में 16 हजार टीबी मरीजों को चिह्नित करने का लक्ष्य रखा गया था। 31 दिसंबर 2021 तक 13666 मरीज ही चिह्नित हुए थे। कोरोना महामारी के कारण भी जांच एवं उपचार प्रभावित हुआ था।