84 कोस परिक्रमा में शामिल है धरणीधर
ब्रज की 84 कोस परिक्रमा मार्ग का आठ कोस का हिस्सा अलीगढ़ से होकर गुजरता है। श्रद्धालु हरियाणा के रास्ते टप्पल के मारव और जैदपुरा से होते हुए मथुरा के सुरीर व कराहरी पहुंचते हैं। यहां से यात्रा कूबरा, गोरई, श्रृंगार गढ़ी और कलिजरी होते हुए बेसवां पहुंचती है। बेसवां में रात्रि विश्राम और दर्शन के बाद श्रद्धालु नयावास, कालाआम, पिथैर और मान चूहरा होते हुए पुनः मथुरा जनपद की सीमा में प्रवेश करते हैं। ऋषि विश्वामित्र की तपोस्थली बेसवां विशेष स्थान रखती है। मान्यता है कि जब राक्षस ऋषि विश्वामित्र के यज्ञ में विघ्न डालते थे, तब मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम और लक्ष्मण ने यहां यज्ञ पूर्ण कराया था।
तीन राज्यों को जोड़ती है 84 कोस की परिक्रमा
यात्रा उत्तर प्रदेश, राजस्थान और हरियाणा के भौगोलिक क्षेत्रों को जोड़ती है। कुल परिक्रमा पथ 250 किलोमीटर से अधिक है, जिसमें 80 प्रतिशत हिस्सा मथुरा में पड़ता है।24 किमी. अलीगढ़ इगलास व टप्पल से गुजरता है। यात्रा को पैदल चलकर औसतन 20-40 दिनों में पूर्ण करते हैं।
मेले में रोज शामिल होंगे एक लाख से अधिक श्रद्धालु
देव भूमि धरणीधर तीर्थ न्यास के हरीश कटारा ने बताया है कि मेले में इस बार एक लाख से अधिक श्रद्धालु रोज शामिल होने की संभावना है। इन्होंने बताया है कि न्यास के प्रचार वाहन ने इस बार बेसवां के आसपास के 500 से अधिक गांवों में जाकर प्रचार किया था। लोगों को मेले में शामिल होने के लिए जागरूक भी किया है।
साधु-संतों विश्राम के लिए बनाईं गईं कुटिया
कटारा ने बताया है कि 84 कोस परिक्रमा में शामिल होने वाले श्रद्धालुओं के िवश्राम के लिए विशेष व्यवस्था की गई है। कुटिया बनाई गई हैं, जिनमें एक बार 250 से अधिक श्रद्धालु विश्राम कर सकते हैं। इसके अलावा पास में बने आम के बाग भी अतिरिक्त व्यवस्था की गई है। इधर, लोगों के मनोरंज के लिए सेल्फी प्वाइंटों बनाए गए हैं जो मेले की शोभा बढ़ा रहे हैं।