हे भगवान! अब न किसी को कोरोना हो और न लॉकडाउन लगे। इसके दंश को सोचने भर मात्र से मन और दिल कांप उठता है। इस बीमारी का दंश मरीज से ज्यादा उसका परिवार झेलता है। मरीज बेशक इलाज के वास्ते अस्पताल में भर्ती हो। मगर उससे दूरी पर परिवार तिल-तिल कर जी रहा होता है। समाज भी परिवार से दूरी बना लेता है। ऐसे में दर्द दोगुना हो जाता है। मगर हां, इस बीमारी से बचाव का एक मात्र मूल मंत्र समाज के उन सजग प्रहरियों की जुबां से सामने आया है, जो समाज के बीच रहकर काम करते रहे और कोरोना की गिरफ्त में आने पर उससे जंग जीतकर फिर काम में जुट गए। 22 मार्च को जनता कर्फ्यू लगने को एक वर्ष पूरा हो रहा है। समाज के उन सजग प्रहरियों की जुबानी कोरोना के दंश की कहानी...
मरीज और परिवार की मानसिकता होती है प्रभावित : अनिल
कोरोना से संक्रमित होने पर दीनदयाल संयुक्त चिकित्सालय (कोविड अस्तपाल) में भर्ती रहे भाजपा के कोल क्षेत्र से विधायक अनिल पाराशर कहते हैं कि यह लाइलाज बीमारी है। इस बीमारी की गिरफ्त में आने पर मरीज के साथ-साथ उसके परिवार की मानसिकता पर असर पड़ता है। मन मस्तिष्क प्रभावित होता है। बीमारी के दौरान मरीज अपनों से दूर हो जाता है। इससे दुखद और कुछ नहीं हो सकता। वे कहते हैं कि जागरूकता, हिम्मत और बचाव ही इसका एकमात्र उपाय है। हम कोरोना से खुद को दूर रखने के लिए अपने दैनिक जीवन में प्रोटोकॉल का पालन करते रहें तो शायद हम बचे रहेंगे। हमारे जीवन पर बीमारी की हालत में सबसे बुरा असर अवसाद में जाने का रहता है। इससे ज्यादा बुरा और क्या होगा। परिवार की हालत भी कुछ ऐसी ही हो जाती है।
कोरोना ने हमारी जिंदगी ही बदल दी : सुमित
शहर के प्रमुख रीयल स्टेट कारोबारी सुमित सर्राफ ने बताया कि कोरोना तो हम पर दुखों का पहाड़ बनकर आया। पहले दादी जी का निधन और फिर कोरोना से पिताजी के निधन ने हमको अंदर से तोड़ कर रख दिया। खुद कोरोना संक्रमित हो जाने के कारण पिताजी का अंतिम संस्कार भी पूरे विधि-विधान से नहीं कर पाए। ये दुख हमेशा रहेगा। पूरा परिवार कोरोना संक्रमित हो गया। लोगों ने हमारे बारे में बहुत कुछ कहा। इस बीमारी ने यही सबक दिया कि ऐसे व्यक्ति का साथ नहीं छोड़ें, जो संक्रमित है। सहयोग नहीं दे सकें तो कम से कम हिम्मत जरूर बढ़ाएं। गलत बयानबाजी न करें। वह तो पहले से परेशान है। ऐसे में उसे हताश न करें। इस दौर में बहुत से लोग तो बीमारी से मरे और कुछ लोग तनाव से मरे। लोगों को कोरोना संक्रमित होने पर घरवालों से दूर होने आदि का डर रहता है। इसलिए लोग बचाव के प्रोटोकॉल के साथ हर मरीज के साथ खड़े रहें।
अनुभव अच्छा भी रहा और बहुत खराब भी : राज
सामाजिक कार्यकर्ता राज सक्सेना ने बताया कि कोरोना काल में जहां अपने पराए हो गए। वहीं कुछ पराए लोगों ने अपनों से ज्यादा मदद की। जब 19 मई को संक्रमित हुआ तो कुछ समय के लिए डर गया था कि अब मेरे परिवार का क्या होगा, क्योंकि मुझे 14 दिनों के लिए अतरौली के कोविड हॉस्पिटल में भर्ती किया गया था। फिर मैंने अपने आप को संभाला और अतरौली हॉस्पिटल पहुंच कर वहां से अपने परिवार से कहा कि मैं बिल्कुल ठीक हूं। लेकिन एक समय बहुत खराब आया, जब मेरी बेटी भी संक्रमित हो गई और वो ऑपरेशन की वजह बेड रेस्ट पर थी। उसे घर में ही क्वारंटीन किया गया। छोटे भाई की पत्नी को प्रसव के चलते दीनदयाल अस्पताल में भरती कराया गया, ऐसे में खुद अतरौली में, बेटी घर पर और मेरा भाई और उसकी पत्नी दीन दयाल हॉस्पिटल में थे। वे दिन बेहद खराब गुजरे।
प्रभु की कृपा से सब ठीक हो गया : संजीव
तत्कालीन एसडीएम कोल एवं वर्तमान विशेष भूमि अध्याप्ति अधिकारी संजीव ओझा कोरोना काल में बेहद सक्रिय रहे। उन्होंने कोरोना से प्रशासनिक और शारीरिक मोर्चे पर लड़ाई लड़ी। कोरोना काल की शुरुआत में वह एसडीएम कोल का चार्ज संभाल रहे थे। तभी अकराबाद के चांदपुर गांव में जिले के पहला केस मिला। रात 10 बजे उनको जानकारी हुई। वह मौके पर पहुंचे। उस समय अन्य कर्मचारी घबरा रहे थे, वह मुंह पर गमछा बांधकर पूरे गांव को सैनिटाइज कराया। प्रवासी श्रमिक जो ट्रेन से आ रहे थे, उनको सकुशल घरों तक पहुंचाने का जिम्मा संभाला। इस दौरान वह संक्रमित हो गए। जेएन मेडिकल कालेज में उनका लंबे समय तक उपचार चला। संजीव ओझा बताते हैं कि वो वक्त बेहद चुनौतीपूर्ण था। मगर, उच्चाधिकारियों के निर्देशन में मेहनत करने का अपना ही मजा था। थोड़ा डर परिवार को था। मगर, प्रभु की कृपा से सब ठीक रहा।
बीमार मां व बेटे से फोन पर संपर्क, खुद हुए बीमारी : धीरेंद्र
मौजूदा इंस्पेक्टर थाना बन्नादेवी और उस समय देहली गेट इंस्पेक्टर के रूप में तैनात धीरेंद्र मोहन का काम किसी से छिपा नहीं है। पहले सीएए को लेकर शाहजमाल में चला महिलाओं का धरना प्रदर्शन संभाला, फिर कोरोना महामारी के दौर में शहर में सबसे पहले उनके थाना क्षेत्र के उस्मानपाड़ा, नीवरी अलहदादपुर व जंगलगढ़ी में कोरोना केस सामने आए। जब शाहजमाल धरना चल रहा था तो बीमार मां दिल्ली के अस्पताल में भर्ती रहीं। बीच-बीच में कभी रात तो कभी दिन में दिल्ली जाकर मां को देख आते थे। लॉकडाउन से ऐन पहले होली पर 12 साल के बेटे का एक्सीडेंट हो गया। परिवार उनके साथ नहीं रहता। बस फोन पर बेटे व मां का हाल चाल लेते रहे। उधर, परिवार को उनकी चिंता सताए जा रही थी और वह परिवार की चिंता छोड़कर कोरोना मरीजों को खोजने के अभियान में जुटे रहे। इसी बीच खुद संक्रमित हुए तो सरकारी आवास में क्वारंटीन रहकर थाने का संचालन एसएसआई के सहयोग से कराया। जब सितंबर में अनलॉक होना शुरू हुआ, तब अवकाश लेकर परिवार के पास गए।
कोरोना से ऐसे कैद रही थी जिंदगी
1-22 मार्च 2020 को पूरे देश में जनता कर्फ्यू लगा था।
2-24 मार्च से 21 दिन के लिए पहला लॉकडाउन लगा था।
3-14 अप्रैल से दूसरा लॉकडाउन तीन मई तक था।
4-4 मई से तीसरा लॉकडाउन 17 मई तक बढ़ाया गया।
5-17 से 31 मई तक चौथा लॉकडाउन कराया गया।
6-31 मई से 8 जून तक पांचवां लॉकडाउन बना रहा।
7-8 जून को पहला अनलॉक हुआ था, बहुत शर्तों के साथ।
संजीव ओझा- फोटो : CITY OFFICE
राज सक्सेना। - फोटो : CITY OFFICE
सुमित।- फोटो : CITY OFFICE