मामले की सुनवाई के दौरान आरोपी दुकानदार कोर्ट में हाजिर नहीं हुआ, जिसके बाद उसके खिलाफ एकपक्षीय कार्यवाही की गई। वहीं, सिगरेट निर्माता कंपनी आईटीसी ने अपना बचाव करते हुए दलील दी कि उनका इस दुकानदार पर कोई सीधा नियंत्रण नहीं है और न ही उसने इस दुकानदार को अपना अधिकृत वेंडर नियुक्त किया है। कंपनी ने यह भी कहा कि वे किसी भी तरह की कालाबाजारी या अनुचित व्यापार व्यवहार में शामिल नहीं हैं।
आयोग की पीठ के अध्यक्ष हसनैन कुरैशी और सदस्य पूर्णिमा सिंह राजपूत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए कंपनी के तर्कों को खारिज कर दिया। कोर्ट ने माना कि दुकानदार, निर्माता कंपनी के प्रॉडक्ट को ही बेच रहा था, इसलिए वह कंपनी का सब-एजेंट माना जाएगा और कंपनी अपने उत्पाद की बिक्री में हो रही कालाबाजारी की जिम्मेदारी से बच नहीं सकती।
उपभोक्ता फोरम ने अपने आदेश जारी किए कि अनुचित व्यापार व्यवहार और आम जनता से छिपी लूट के खिलाफ कोर्ट ने उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 की धारा 39(1)(के) के तहत दोनों विपक्षी गणों पर 10 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है, जिसे उपभोक्ता कल्याण कोष में जमा कराया जाएगा।
कोर्ट ने आदेश दिया कि शिकायतकर्ता को उससे वसूले गए अतिरिक्त 20 रुपये 18% वार्षिक ब्याज के साथ वापस किए जाएं। साथ ही मानसिक उत्पीड़न के लिए 5,000 रुपये का मुआवजा और अदालती खर्च के रूप में 5,000 रुपये अलग से दिए जाएं। आयोग ने दोनों विपक्षी पक्षों को आदेश का पालन करने के लिए 45 दिनों का समय दिया है। यदि तय समय में आदेश का पालन नहीं किया गया, तो उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की धारा 72 के तहत कड़ी दंडात्मक कार्यवाही (सजा) की जाएगी।