एसएमवी मार्केट की ‘आखिरी अड्डा’ मोबाइल शॉप पर एमएससी की छात्रा की गोली मारकर हत्या के बहुचर्चित मामले में बृहस्पतिवार को अदालत ने फैसला सुना दिया। प्रेमिका की हत्या के दोषी मोबाइल शॉप संचालक को उम्रकैद व जुर्माने की सजा सुनाई गई है। यह फैसला एडीजे विशेष एससी-एसटी मनोज कुमार अग्रवाल की अदालत ने सुनाया है। घटना 9 मई 2017 की है।
अभियोजन अधिवक्ता एडीजीसी चमन प्रकाश शर्मा के अनुसार, आंबेडकर कॉलोनी, नौरंगाबाद छावनी निवासी आरपीएफकर्मी राधाचरण ने सिविल लाइंस थाने में मुकदमा दर्ज कराया था, जिसमें कहा था कि उसकी 25 वर्षीय बेटी बबिता आगरा रोड के ज्ञान महाविद्यालय में एमएससी रसानयन विज्ञान की अंतिम वर्ष की छात्रा थी। घटना के दिन दोपहर करीब डेढ़ बजे वह मोबाइल सही कराने एसएमवी मार्केट स्थित आखिरी अड्डा मोबाइल शॉप पर गई थी, जहां दुकानदार साईं मंदिर सुरेंद्र नगर निवासी अरुण कुमार वार्ष्णेय से उसका किसी बात पर विवाद हुआ और उसने करीब चार बजे बबिता की देशी पिस्टल से गोली मारकर हत्या कर दी। इसके बाद अपनी कार में शव डालकर ठिकाने लगाने ले जा रहा था। तभी पुलिस चेकिंग में घंटाघर एसबीआई तिराहे पर वह अपनी अल्टो कार संख्या डीएल 3 सीसीएफ 2071 सहित पकड़ा गया, जिसमें पिछली सीट पर खून से लथपथ बबिता की लाश बरामद हुई। आरोपी से हत्या में प्रयुक्त पिस्टल भी बरामद हुई। विवेचना के दौरान उजागर हुआ कि बबिता व अरुण के बीच प्रेम संबंध थे। युवती अरुण से मिलने आई थी। इसी आधार पर हत्या व एससी-एसटी एक्ट के तहत चार्जशीट दायर की गई। सत्र परीक्षण के दौरान साक्ष्यों व गवाही के आधार पर अदालत ने अरुण को दोषी करार देते हुए उम्रकैद व 50 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई है। जुर्माना राशि में से 30 हजार रुपये पीड़ित पक्ष को देने के निर्देश दिए हैं।
कार में लाश लेकर घूमा था अरुण, थाने पर हुआ था हंगामा
इस बहुचर्चित हत्याकांड में यह तथ्य विवेचना में भी उजागर हुआ है और खुद अभियोजन व बचाव पक्ष भी जिरह में लाया है कि आरोपी लाश लेकर कार में घूमा था। पुलिस विवेचना के अनुसार, बबिता के पेट में गोली लगने के बाद उसे अपनी गलती का अहसास हुआ तो उसे अपनी स्कूटी पर बैठाकर विष्णुपुरी के नर्सिंग होम लेकर गया, जहां डॉक्टरों ने उसे हालत नाजुक होने पर हायर सेेंटर ले जाने की सलाह दी और पुलिस को सूचना दे दी। इस पर एक तरफ अरुण ने तत्काल किसी से कार मंगाई और बबिता को गाड़ी में पिछली सीट पर डालकर चल दिया, जब तक बबिता की मौत हो चुकी थी। वह मीनाक्षी पुल के नीचे से रेलवे स्टेशन के सामने से होकर दिल्ली की ओर जा रहा था। मंशा थी कि लाश को कहीं ठिकाने लगा देगा। चूंकि, नर्सिंग होम की सूचना पर पुलिस सतर्क हो गई थी। उस कार को खोजा जा रहा था। इसी बीच उसे घंटाघर पर दबोच लिया गया। इस दौरान पता चला कि अरुण ने अपनी खून से सनी शर्ट को रास्ते में नाले में फेंक दिया था। इसके बाद जब उसे पुलिस थाने ले गई तो वहां परिजनों ने पहुंचकर हंगामा किया था।
ये थी बचाव पक्ष की दलील
अरुण के अधिवक्ता की ओर से यह तथ्य पेश किया गया कि अरुण पर आरोप झूठा लगाया गया है। जब बबिता उससे मिलने आई थी तो उसके साथ एक अन्य युवक आया था, जिसने अरुण पर गोली चलाई। उसी गोली से बबिता जख्मी हुई। बाद में खुद अरुण उसे बचाने के इरादे से लेकर भागा और बाद में दिल्ली ले जा रहा था। मगर साक्ष्यों के आगे यह दलील खारिज हो गई।
10 गवाह किए गए थे पेश
इस मामले में वादी पक्ष से पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता चंद्रशेखर दीक्षित ने बताया कि मामले में 10 गवाह पेश किए गए, जिनमें वादी पिता, अरुण प्रधान सहित दो पब्लिक के गवाह, डॉक्टर पोस्टमार्टम करने वाले के अलावा सीसीटीवी, पुलिस के गवाह, पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर शामिल हैं। जिनके आधार पर अदालत ने हमारी अपील स्वीकारते हुए सजा सुनाई है।