भाजपा के 26 से अधिक नेताओं ने शहर विधानसभा सीट पर दावेदारी ठोकी है। यह सीट बीस साल पहले भाजपा के हाथ से फिसल गई थी। टिकट के बारे में तमाम तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं। भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती हाथ से फिसली सीट वापस लाना है। जानकारों की मानें तो भाजपा को विरोधियों से ज्यादा अपनों से खतरा है।
1974 में ठाकुर इंद्रपाल सिंह एवं 1977 में जनसंघ के प्रत्याशी प्रो. मौजिज अली बेग शहर विधानसभा से विधायक चुने गए थे। उसके बाद 1989, 1991 एवं 1993 में भाजपा से कृष्ण कुमार नवमान शहर विधानसभा क्षेत्र से विधायक चुने गए। 1996 में अब्दुल खलिक ने नवमान को करारी शिकस्त देकर भाजपा को शहर विधान सभा सीट से बेदखल कर दिया। उसके बाद से आज तक भाजपा अपने खोये सम्मान को हासिल नहीं कर सकी है। 2012 के विधान सभा चुनाव में सपा के जफर आलम ने आशुतोष वार्ष्णेय को हराया। 2007 में सपा के जमीरउल्लाह खां ने संजीव राजा को पराजित किया। 2002 में कांग्रेस के विवेक बंसल ने दीपक मित्तल को शिकस्त दी। जानकारों का कहना है कि भाजपा को विरोधियों से ज्यादा अपनों ने नुकसान पहुंचाया। हाईकमान ने ध्यान नहीं दिया तो इस बार भी इतिहास की पुनरावृत्ति से इंकार नहीं किया जा सकता है।