मशहूर पाकिस्तानी साहित्यकार इंतिजार हुसैन की यादों में उनकी जन्मभूमि बसती थी। बुलंदशहर के कस्बा डिबाई में जन्मे इस प्रख्यात साहित्यकार ने वर्ष 2004 में स्थानीय साहित्यकार प्रेमकुमार आदि की मदद से डिबाई में उस घर को ढूंढा था, जहां वह पैदा हुए। उस अनूठी यात्रा को इंतिजार साहब ने अपनी आत्मकथा ‘जुस्तजू क्या है’ में कुछ इस तरह बयां किया है--
‘मैं अपनी बस्ती के दर्शन के शौक में बूंदों में भीगता दौड़ा चला जा रहा हूं। और लीजिए बस्ती ने दर्शन दे दिए। मिट्ठनलाल की दुकान ने अजब जादू जगाया। बस वहां खडे़ होकर ईदगिर्द नजर डाली तो पूरी बस्ती का जुगराफिया मुनव्वर हो गया। अब मुझे रोशन था कि कौन सा रास्ता किधर जा रहा है और कौन सी गली किस गली में जाकर निकलेगी। गुजरते-गुजरते एक चबूतरे को देखकर ठिठका। अरे ये तो वही चबूतरा है, जहां रंगगेज नादों में नीले-पीले कपड़े रंगते नजर आते थे, मगर वो रंगरेज कहां चले गए। ‘
‘देखें, गाड़ी सीधे हाथ पे मोड़ लें।’
सीधे हाथ पर मुड़ते ही सामने क्या देखता हूं। फकीरा हलवाई की दुकान। अरे, बिल्कुल वैसे की वैसी ही है। तो बस अब हमारा घर आ गया। चंद कदम के फासले पर तो था। मगर चंद कदम का फासला तय किया तो सारा नक्शा ही बदला हुआ नजर आया। मैं हैरान कि यहां जो घर थे वो कहां गए। यहां तो नक्शा ही कुछ और है। न वो दीवार की सूरत और न वो दर की सूरत।
‘प्रेम कुमार जी, जगह तो वही है। यहीं हमारा घर था। अब तो नहीं है। पता नहीं कहां चला गया’
‘कुछ निशानी बताइए’
‘जरा ये मालूम कीजिए कि फकीर चंद हलवाई का घर कौन सा है। यहीं कहीं था। ऐन उनके सामने हमारा घर था।’
‘फकीर चंद की दुकान तो पीछे छोड़ आए।’
‘वो तो दुकान थी, उसका घर यहीं कहीं था।’
प्रेम कुमार ने पूछताछ शुरू कर दी। दम के दम में ईद-गिर्द के कितने लोग जमा हो गए। जैसे उन सबके कान में किसने ने पिरो दिया हो कि पाकिस्तान से एक अजनबी आया है और अपना घर ढूंढ रहा है।
‘इंतिजार साहब, आप जिस घर के सामने खड़े हैं, यही फकीर चन्द का घर है।’ और प्रेम कुमार ने फौरन आगे बढ़कर दरवाजा खटखटाया। एक जवान बाहर निकल कर आया और हैरान हुआ कि उसके घर के सामने यह कैसा मजमा लगा है। मैने आगे बढ़कर पूछा ‘फकीर चंद जी का मकान यही है।’
‘हां यही है।’
‘वो कहां हैं..?’
‘उनकी तो बहुत दिन हुए मृत्यु हो गई, मैं उनका पोता हूं। ’
‘अच्छा-।’ और फिर मैं फौरन पलट कर सामने वाले मकान की तरफ देखने लगा। कितनी देर तकता रहा। समझ में न आया कि ये घर कौन सा है। हमारा तो है नहीं। फिर सदर दरवाजे की दहलीज पर दायें-बायें दो पत्थर की चौकियां देखकर थोड़ा तजस्सुस हुआ। हमारे सदर दरवाजे के दायें-बायें भी चौकियां तो थी, मगर ये वो दरवाजे तो नहीं है।
फिर बराबर में कमरे के तीन दरवाजे देखकर थोड़ा ठिठका। हमारे घर में वो जो हाल कमरा था, उसके भी तीन दरवाजे बाहर सड़क पर खुलते थे, मगर ये वो दरवाजे नहीं हैं। परेशान होकर मैं आगे चल पड़ा। चंद कदम चला था कि एक मस्जिद के मीनार नजर आने लगे। अरे ये तो वही हमारी मस्जिद है। मैं इसे कैसे भूल सकता हूं। कितनी नमाजें मैंने यहां पढ़ी थीं और उस जमाने में मैं कितना पक्का नमाजी था और मैंने पलट कर फिर उस मकान पर नजर डाली, जिसके दरो-दीवार देखकर मैं चकनम में पड़ गया था। मगर जब कुछ समझ में न आया तो मैं आगे बढ़ गया।
‘प्रेमकुमार जी शायद वही हमारा घर है।’
‘तो फिर चलकर देख लें। ’
‘देख के क्या करेंगे। सारा नक्शा ही बदल गया।’