कोविड महामारी के दौरान लग रहा है कि दीनदयाल अस्पताल के स्टाफ की संवेदनाएं ही जैसे मर ही गई हैं। 30 अप्रैल को बेगमबाग निवासी बीना घोष की मौत हो गई थी, शव देने के एवज में आठ रुपयों की मांग की जा रही थी। रुपये न होने पर बेटा शंकर परेशान था। मामला सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद प्रभारी डीएम ने संज्ञान लिया और जांच एसडीएम कोल को सौंप दी गई है। इसके बाद शव भी शंकर को सौंप दिया गया।
मूल रूप से कोलकाता की रहने वाली बीना घोष गांधी आई अस्पताल से रिटायर्ड थीं। 24 अप्रैल को उनकी कोरोना संक्रमण की रिपोर्ट आई थी, उसी दिन उन्हें दीनदयाल उपाध्याय संयुक्त चिकित्सालय के कोरोना वार्ड में भर्ती कराया गया।
30 अप्रैल को उनकी मौत हो गई। बेटे शंकर ने बताया कि 30 तारीख से चक्कर लगा रहा है। लेकिन मां का शव नहीं दिया जा रहा। एक कर्मचारी ने आठ हजार रुपये मांगे थे। रुपये नहीं दिए तो शव नहीं दिया।
शंकर की पीड़ा को एक स्थानीय पत्रकार ने सोशल मीडिया और ट्विटर पर ट्वीट किया। इस पर प्रभारी जिलाधिकारी ने इस मामले की जांच एसडीएम कोल को सौंप दी। इसके बाद शंकर को शव सौंप दिया गया है।
डीएम की आईडी से ट्वीट करके यह जानकारी दी गई है कि अस्पताल प्रशासन की प्रारंभिक जांच में स्पष्ट हुआ है कि मृतक महिला के पुत्र से किसी अंजान व्यक्ति ने शव सुपुर्द करने के बदले रुपयों की मांग की थी।
महिला की मृत्यु के बाद परिवारीजनों की जानकारी न मिलने पर शव सुपुर्द करने में देरी हुई है। साथ ही डीएम की आईडी से बेटे शंकर को मां का शव रविवार को सुपुर्द करने की जानकारी भी साझा की गई।
अब यहां सवाल उठता है कि 30 अप्रैल को ही जिला अस्पताल में स्ट्रेचर पर ही अतरौली निवासी रामनिवास त्यागी की मौत हुई थी। इनकी कोरोना की जांच नहीं हुई, फिर शव को बिना परिजनों के सूचना दिए नुमाइश श्मशान स्थल में जलाया गया।
दूसरी तरफ कोरोना संक्रमित की मौत होने के बाद 30 अप्रैल से दीनदयाल अस्पताल में शव रखा रहा। ऐसे प्रकरणों से स्वास्थ्य विभाग के कामकाज पर सवाल खड़े होने लगे हैं।