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अलीगढ़ः 19 80 में सिर्फ 50 हजार रुपये खर्च कर विधायक बने अनवार खां

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अनवार खां। - फोटो : CITY OFFICE
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भूपेंद्र चौधरी
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आज के समय में 50 हजार रुपये खर्च करके नगर पालिका के सभासद का चुनाव भी नहीं जीता जा सकता, लेकिन वर्ष 1980 में महज 50 हजार रुपये खर्च करके विधायक का चुनाव जीत गए थे अनवार खां। पहले आम चुनाव की सादगी और मौजूदा वक्त में गाड़ियों के दौड़ते काफिलों तक पहुंची राजनीति को कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रहे वयोवृद्ध डॉ. अनवार खां ने अपनी आंखों से देखा है।
अतरौली विधानसभा उनकी कर्मस्थली है। राजनीति में पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह उनके सबसे करीबी प्रतिद्वंद्वी रहे। 1974 से 2002 तक अतरौली की राजनीति धुरी कल्याण सिंह और डॉ. अनवार खां के बीच ही घूमती रही है। पुराने चुनावों की यादें ताजा करते हुए डॉ. अनवार खां कहते हैं कि तब एक जीप से ही प्रचार करते थे। जनता के द्वार सीधा संवाद। 1980 के चुनाव में खुद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी उनका प्रचार करने अतरौली आई थीं और खुद कई गांवों में पगडंडियों से होते हुए जनता के बीच वोट मांगने पहुंची थीं। कुछ जगहों पर रास्ता बेहद खराब था तो मिट्टी डलवाकर खरंजा डलवाया गया।
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रामलहर में भी जमकर मिले हिंदू वोट
डॉ. अनवार खां के मुस्लिम होने के बाद भी हिंदू वोटरों पर अच्छी पकड़ थी। अनवार खां कहते हैं कि अतरौली विधानसभा में उस वक्त सिर्फ 10 हजार मुस्लिम और 75 हजार लोधी मतदाता था। 250 पोलिंग सेंटर पर मैं और 150 पोलिंग सेंटर पर कल्याण सिंह जीतते थे। लोध बहुल इलाकों के बूथों पर 90 प्रतिशत पोलिंग होती थी। आलम यह होता था कि कई चुनावों में हार जीत का अंतर बेहद कम रहा। डॉ. अनवार खां कहते हैँ कि 1991 और 1993 में रामलहर के बावजूद अतरौली में हिंदू वोटरों से मिले अपार जनसमर्थन के दम पर कल्याण सिंह को कड़ी टक्कर देते हुए 65 हजार से भी अधिक वोट पाए।
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बहू समान प्रेमलता के सामने नहीं लिया कांग्रेस का टिकट
डॉ. अनवार खां कहते हैं कि वह उसूलों की राजनीति करते हैं। कल्याण सिंह के सामने उन्होंने 2002 में अपना अंतिम चुनाव लड़ा था। 2004 में कल्याण सिंह के सांसद बन जाने पर अतरौली सीट पर उपचुनाव में भाजपा ने कल्याण सिंह की पुत्रवधू प्रेमलता वर्मा को मैदान में उतारा। कांग्रेस आलाकमान ने उन्हें अतरौली से चुनाव लड़ने के लिए कहा, लेकिन उन्होंने यह कहते हुए मना कर दिया कि यदि कल्याण सिंह चुनाव लड़ते थे मैं चुनाव अवश्य लड़ता, लेकिन प्रेमलता मेरी बहू-बेटी समान हैं इसीलिए मैं उनके सामने चुनाव नहीं लड़ सकता।
राजनीतिक सफर
1957 से 20 साल तक नगर पालिका के सभासद रहे।
1980 में पहली बार विधायक बने औऱ राज्यमंत्री रहे।
1974, 1977, 1985, 1989, 1991, 1993, 1996, 2002 में विधानसभा का चुनाव लड़े और हार मिली।
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