पूर्व केंद्रीय मंत्री और कर्नाटक व केरल के पूर्व राज्यपाल डॉ. हंसराज भारद्वाज ने कहा है कि भारतीय संविधान ने अल्पसंख्यकों के शैक्षिक और सांस्कृतिक उत्थान के लिए विशेष कानूनी दर्जा दिया है। एएमयू अपनी स्थापना से ही एक अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान है।
वह शनिवार को एएमयू में एएमयू स्टूडेंट्स एक्शन कमेटी द्वारा आयोजित कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। अलीगढ़ मुसलिम विश्वविद्यालय के अल्पसंख्यक स्वरूप की बहाली पर एक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया था। उन्होंने कहा कि वह इस संस्था के इतिहास और इसके स्वरूप के साथ-साथ इसके योगदान से भी भलि भांति परिचित हैं और उनका यह विश्वास है कि एएमयू कैंब्रिज, ऑक्सफोर्ड और हावर्ड से भी महान संस्था है। हंसराज भारद्वाज ने विश्वविद्यालय के अधिकारियों को परामर्श दिया कि उन्हें सुप्रीम कोर्ट में इस केस के लिए पूरी तैयारी के साथ पैरवी करनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि उन्हें यह बात मालूम है कि बहुत से मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय बदले हैं और कभी कभी सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों के विपरीत केंद्र सरकार ने नए कानून को बनाकर फैसले को बदला है। उन्होंने कहा कि वह लगातार 16 साल तक देश के कानून मंत्री रह चुके हैं और उन्हें यह मालूम है कि अजीज बाशा का केस सुप्रीम कोर्ट का एक पक्षीय निर्णय था। जिसमें एएमयू को पार्टी नहीं बनाया गया था। उन्होंने भारत सरकार से आग्रह किया कि वह एएमयू के अल्पसंख्यक स्वरूप की बहाली के लिए स्वयं ही पहल करे क्योंकि शिक्षा और संस्कृति की रक्षा करना केंद्रीय सरकार का संवैधानिक दायित्व है। उन्होंने कहा कि अलीगढ़ मुसलिम विश्वविद्यालय के संस्थापक सर सैयद अहमद खान एक महान समाज सुधारक थे। उन्होंने अंग्रेजी शिक्षा पर बल दिया जो आज की सबसे बड़ी जरूरत है।
सुप्रीम कोर्ट के वकील और सांसद केटीएस तुलसी ने कहा कि नि:संदेह एएमयू एक अल्पसंख्यक संस्था है और जो लोग इसका विरोध कर रहे हैं वह भारतीय संविधान में अल्पसंख्यकों को दिए गए अधिकारों का खुला उल्लंघन कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि मुसलिम समाज एक शक्तिशाली अल्पसंख्यक समाज है और अल्पसंख्यक स्वरूप का मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। उन्होंने कहा कि हरियाणा और पंजाब में नदी के पानी को लेकर सुप्रीम कोर्ट में जो विवाद था, उसे संसद ने एक्ट बना कर हल किया। भारतीय संसद को कानून बनाने और सुप्रीम कोर्ट को उसकी व्याख्या करने का अधिकार है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में संसद ही सर्वोपरि है।
अध्यक्षता करते हुए कुलपति जमीरउद्दीन शाह ने कहा कि एएमयू के अल्पसंख्यक स्वरूप की बहाली के लिए कानूनी लड़ाई सिर्फ मुसलमान ही नहीं लड़ रहे बल्कि सभी धर्म और समुदायों के लोग इसमें शामिल हैं। उन्होंने कहा कि एक शक्तिशाली व्यक्ति ही साहसी निर्णय ले सकता है और उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर पूरा भरोसा है कि वह इस मामले में साहसिक निर्णय लेने में पूरी तरह सक्षम हैं। सुप्रीम कोर्ट में इस केस की पैरवी के लिए बहुत ही योग्य वकीलों को रखा गया है। उन्होंने अलीग बिरादरी से आग्रह किया कि वह इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट पर ही आस्था रखें और इस मामले को सड़कों पर न ले जाएं। उन्होंने कहा कि उन्होंने अपना पूरा जीवन विभिन्न धर्मों के लोगों के साथ व्यतीत किया है। उन्हें विश्वास है कि सभी वर्गों का समर्थन मिलेगा। पीवीसी सैयद अहमद अली ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने टीएमए पाई और सेंट स्टीफन केस में अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा की है। उन्होंने कहा कि भारतीय संसद कानून बना सकती है तो उसमें संशोधन का भी अधिकार प्राप्त है।
वरिष्ठ पत्रकार कुर्बान अली ने कहा कि 1875 से 1965 तक अल्पसंख्यक मामले पर कोई विवाद नहीं था। 1965 में करीम भाई छागला ने इस संस्था का मूल स्वरूप बदल दिया, तभी से यह मामला अल्पसंख्यकों के अधिकारों से जुड़ गया। उन्होंने कहा कि स्वयं अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण अडवानी एएमयू के अल्पसंख्यक स्वरूप के पक्ष में थे। 1977 के चुनाव घोषणा पत्र में भाजपा, सीपीआई और सीपीएम भी इसके पक्ष में थे।
भाजपा के उपाध्यक्ष राम जेठमलानी और सुब्रमणियम स्वामी ने भी संसद में एएमयू के अल्पसंख्यक स्वरूप के लिए आवाज उठाई है। एक्जीक्यूटिव काउंसिल के पूर्व सदस्य डॉ. मो. शाहिद ने अल्पसंख्यक स्वरूप के इतिहास पर विस्तार से प्रकाश डाला। सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के पूर्व सचिव डॉ. चौधरी शम्शुद्दीन ने भी अपने विचार व्यक्त किए। कमेटी के कनवीनर मो. शहंशाह खान ने अतिथियों का स्वागत किया। इस अवसर पर मो. शिकोह, फहीम अख्तर आदि मौजूद थे। छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष अब्दुल हफीज गांधी ने संचालन किया।