अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के अल्पसंख्यक स्वरूप को लेकर केंद्र सरकार के बदले रुख से एक बार फिर एएमयू में केंद्र एवं भाजपा विरोधी माहौल बनने लगा है। साथ ही केंद्र से बेहतर रिश्ते बना कर एएमयू को लाभ पहुंचाने के प्रयासों को भी झटका लगने का अंदेशा पैदा हो गया है। ऐसे लोग बैकफुट पर आ गए हैं।
केंद्र सरकार ने 11 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट से एएमयू को अल्पसंख्यक दर्जा समाप्त करने वाले इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली यूपीए सरकार के हलफनामे को वापस लेने का आग्रह किया था। इसके बाद से एएमयू में केंद्र सरकार एवं भाजपा विरोधी माहौल तैयार होने लगा है। अभी यहां अवकाश है। इस कारण कैंपस में छात्र-शिक्षकों की संख्या कम है। इसके बावजूद 17 जनवरी को विश्वविद्यालय खुलने पर इस मामले में केंद्र के रुख के खिलाफ छात्राें के सड़क पर उतरने के संकेत मिलने लगे हैं।
ऐसे में वे लोग अलग-थलग पड़ गए हैं, जो नरेंद्र मोदी सरकार से रिश्ते बेहतर करने के पक्ष में थे। इसकी बनगी मंगलवार को उस समय दिखी, जब इस मसले पर कुलपति सभी प्रमुख बॉडी के प्रतिनिधियों , विभिन्न संगठनों के अध्यक्षों सेे विचार-विमर्श कर रहे थे। इस बीच एक सीनियर प्रोफेसर ने दीक्षांत समारोह में प्रधानमंत्री को बुलाने और उनके समक्ष समस्या रखने की बात कह दी। यह भी सुझाव दिया कि यदि पीएम को यहां बुलाने में दिक्कत है तो यह आयोजन दिल्ली में किया जाए। इस पर वहां मौजूद अधिकांश लोगों ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की।
गौरतलब है कि एएमयू कुलपति जमीरउद्दीन शाह पिछले ने महीने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय विदेश राज्य मंत्री जनरल वीके सिंह एवं केंद्रीय गृह राज्य मंत्री के अतिरिक्त कई नेताओं एवं दिल्ली के अधिकारियों से मुलाकात की थी। यही नहीं एएमयू छात्र एवं सर सैयद माइनोरिटी फाउंडेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष परवेज सिद्दीकी बिजनौर से बीजेपी सांसद कुंवर भारतेंद्र के साथ केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी से मिले थे। उन्हें एएमयू में बुलाने की भी इच्छा व्यक्त की थी।
इसके अलावा कई छात्र, शिक्षक, ओल्ड ब्वायज एवं इंतजामिया के लोग केंद्र से मधुर संबंध बनाने के लिए अलीगढ़ से दिल्ली तक दौड़ लगाते रहे हैं। हाल में एएमयू में मेक इन इंडिया एवं योगा पर आयोजित सेमिनार को भी इसी पहल का एक हिस्सा माना जा रहा है। इस बीच केंद्र के मौजूदा रुख के बाद ये भी बचाव की मुद्रा में आ गए हैं।
एएमयू छात्र संघ के पूर्व उपाध्यक्ष मसूद उल हसन का कहना है कि केंद्र से रिश्ते बेहतर बनाने की वकालत कुछ लोग कर रहे थे। उनसे भी भाजपा के खिलाफ नहीं बालने को कहा गया था। साथ ही ऐसा न करने पर एएमयू का फंड रोके जाने का खतरा जताया गया था। जबकि अब ऐसे लोगों के पास कोई जवाब नहीं है। हमें तो पहले से आभास था कि इस सरकार में अल्पसंख्यकों को कुछ मिलने वाला नहीं। वे लोग प्रधानमंत्री या उनके मंत्री को कैंपस में नहीं आने देंगे। इस बीच सर सैयद माइनोरिटी फाउंडेशन के अध्यक्ष परवेज सिद्दीकी के भी सुर बदले हुए हैं। सोशल मीडिया पर केंद्र के रुख का विरोध किया है।