फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

सबका साफ हुआ पत्ता, भाजपा का सत्ते पे सत्ता

Sun, 12 Mar 2017 02:29 AM IST
अमर उजाला ब्यूूराे
विज्ञापन
अलीगढ़ में सातों विधानसभा सीटों पर प्रचंड जीत के बाद महानगर कार्यालय पर खुशी मनाते भाजपाई। - फोटो : Amar Ujala
विज्ञापन
अलीगढ़ की सातों विधानसभा सीटों पर भाजपा ने सबका (सपा, बसपा, कांग्रेस) पत्‍ता साफ कर दिया।  प्रचंड बहुमत ने समर्थकों में जोश भर दिया है। गैर भाजपाई दल भी मोदी लहर को देखकर  हैरत में हैं। सत्ता की खिलाफत, कुछ विधायकों का मनमाना रवैया, पुलिस प्रशासन की तानाशाही इस चुनाव में ध्रुवीकरण की मुख्य वजह बना जा रहा है। 
विज्ञापन


शहर में ‘ध्रुवीकरण’ ने केसरिया फहराया तो कोल में सपा-कांग्रेस के ‘हठबंधन’ ने भाजपा का रास्ता आसान कर दिया। खैर और इगलास में जाटलैंड के समर्थन ने भाजपा पर जीत का रंग लगाया। ‘बाबूजी’ कल्याण सिंह की भाजपा में हुई वापसी सुपौत्र संदीप को जीत दिलाने में मददगार साबित हुई। हवा का रुख भांप चुके बरौली विधायक ठा. दलवीर ने भाजपा का दामन थामकर फिर से जीत का स्वाद चखा है। छर्रा में सत्तारूढ़ विधायक की खिलाफत के कारण नये चेहरे के रूप में उभरे रवेंद्र पाल सिंह को एक लाख से अधिक वोट मिले। इन सब वजहों में एक बड़ी पीएम मोदी का बढ़ता जनसमर्थन है। जिसकी आंधी पूरे प्रदेश में चली है। खास बात ये कि भाजपा के सात विजयी विधायकों में से छह को एक लाख से अधिक वोट मिले हैं।

21 साल बाद फिर केसरिया हुआ शहर
बेशक सूबे में सत्ता विरोधी और मोदी लहर चली मगर शहर सीट पर वोटों का ध्रुवीकरण इस बार सपा की हार और भाजपा की जीत का बड़ा कारण बना। यही वजह है कि केके नवमान के बाद अब 21 साल बाद भाजपा की इस सीट पर वापसी हुई है। हालांकि अंतर कलह को लेकर भाजपा चिंतित थी, मगर मोदी लहर ने कलह को रौंदते हुए संजीव राजा को जीत दिलाई है। मतगणना के समय राउंड वार स्थिति में वोटों का ध्रुवीकरण साफ-साफ दिखा। जब 16 से 19 राउंड में मुस्लिम इलाकों के वोट खुले तो जफर आलम 18 हजार   मतों से आगे निकल गए, मगर    हिंदू आबादी वाले राउंड में गिनती होते ही स्थिति उलट हो गई और लगातार दो बार से सपा के खाते की शहर सीट भाजपा ने छीन ली। हालांकि संजीव राजा 2007 में भी भाजपा से चुनाव लड़े थे, उस समय अंतर्कलह ने उन्हें हराया था। 
विज्ञापन


गठबंधन में दरार भाजपा की नैया पार 
कोल सीट पर मौजूदा सपा विधायक जमीरउल्लाह का टिकट काटकर सपा ने महानगर अध्यक्ष अज्जू इशहाक को मैदान में उतारा। प्रदेश में सपा-कांग्रेस गठबंधन के बावजूद इस सीट पर सहमति नहीं बनी और कांग्रेस ने विवेक बंसल को चुनाव लड़ाया। वहीं सपा के बागी के रूप में खुद जमीरउल्लाह निर्दलीय मैदान में आ गए। सपा-कांग्रेस गठबंधन इस सीट पर हठबंधन बनकर रह गया। इसी दरार ने मोदी लहर को हवा दी। जिसका सीधा सीधा लाभ भाजपा प्रत्याशी अनिल पाराशर को मिला। उनकी जीत का अंतर भी काफी रहा। इससे पहले 1996 में भाजपा की रामसखी कठेरिया ने इस सीट पर जीत हासिल की थी। हालांकि कोल सीट के शहरी आबादी वाले इलाके में भाजपा कमजोर रही, मगर जैसे ही देहात से जुुडे़ इलाकों की मतगणना शुरू हुई तो भाजपा ने बढ़त बनाना शुरू कर दिया। 

दलवीर ने भांप लिया था हवा का रुख 
जनपद की सबसे प्रतिष्ठापूर्ण और यूपी की अतिसंवेदनशील सीटों में शुमार बरौली सीट पर लगातार दूसरी बार मौजूदा विधायक ठा. दलवीर सिंह ने यह सीट जीती है। इस सीट पर लगातार दूसरी बार हार भी बसपा के कद्दावर नेता ठा. जयवीर सिंह की हुई है। इस सीट पर जीत का कारण ठा. दलवीर सिंह की खुद की साख और भाजपा के नाम पर चली मोदी लहर बड़ी वजह मानी जा रही है। इसके अलावा वोटों का ध्रुवीकरण हुआ और उन्हें विजयश्री हासिल हुई। पूर्व मंत्री जयवीर सिंह को इस बात का कतई अहसास न था कि उन्हें इतने बड़े अंतर से हार का सामना करना पड़ेगा। मगर जैसे-जैसे मतगणना में उनके और दलवीर सिंह के वोटों में अंतर बढ़ता गया, उनके चेहरे की रंगत बदलती गई और वे तीन राउंड पहले ही मतगणना स्थल से चले गए। बघेल वोट केशव बघेल को मिल गए। 

संदीप को मिला बाबूजी का आशीर्वाद 
अपने राजनीतिक जीवन में 1967 से अतरौली सीट पर चुनाव लड़ते आ रहे पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह अपनी पैतृक सीट पर अब तक सिर्फ 1980 में कांग्रेस प्रत्याशी रहे अनवार खां से चुनाव हारे। इसके बाद 2012 में उनकी पुत्रवधू प्रेमलता वर्मा को हार का सामना करना पड़ा। उन्हें ऐसे प्रत्याशी ने मात दी जिनके पिता ने कभी खुद कल्याण सिंह को हराया   था। पिछली बार हार की वजह   बाबूजी के भाजपा से अलग होने और जेकेपी से चुनाव लड़ना बना। भाजपा में बाबूजी ने वापसी की। उनके   सुपौत्र संदीप को पार्टी ने टिकट दिया। इस सीट पर वीरेश यादव का     विरोध और सत्ता विरोधी लहर,    बाबूजी का कल्याण सिंह के साथ होना संदीप की जीत की बड़ी वजह माना जा रहा है। मतगणना के दौरान वीरेश यादव शुरू से ही पीछे रहे, राउंड दर राउंड यह फासला बढ़ता ही चला गया। 

जाटों ने भर दी भाजपा की झोली
इगलास सीट पर राष्ट्रीय लोकदल को हमेशा मजबूत माना जाता रहा है। इसी मजबूती के चलते पिछली बार की तरह इस बार भी राष्ट्रीय लोकदल ने अपना प्रत्याशी बदला। मगर इस बार जाटों ने रालोद से किनारा कर लिया और रालोद को तीसरे पायदान पर पहुंचा दिया। सबसे खास बात है कि जिले में इस सीट पर भाजपा को सर्वाधिक मत मिले। यहां भाजपा प्रत्याशी को सिर्फ बसपा प्रत्याशी ने शुरू में टक्कर दी। मगर वह भी पिछली बार की तरह इस बार भी 53 हजार पर सिमट कर रह गए। जाट बाहुल्य इलाकों में वोट खुले तो भाजपा जीत गई।

सपा विधायक से नाखुश थे लोग 
कल्याण के प्रभाववाली छर्रा सीट पर लंबे समय तक भाजपा के डा. राम सिंह विधायक रहे। मगर पिछली बार उनके अलग होने के कारण सपा के युवा नेता राकेश ने जीत दर्ज की। मगर पिछले पांच साल में उनके प्रति लोगों का विरोध और सत्ता विरोधी लहर के अलावा मोदी लहर ने यह सीट फिर भाजपा के कब्जे में दिलाई। कल्याण सिंह के बेहद करीबी रवेंद्र पाल सिंह पिछली बार इसी सीट पर जेकेपी से चुनाव लड़े थे। मगर उन्हें लोगों ने उन्हें उस समय पसंद नहीं किया। इस बार इन तमाम वजहों से वह जीत दर्ज करने में सफल हुए।

रालोद से डिगा जाटों का भरोसा 
जाट बाहुल्य खैर विधानसभा पर भी रालोद के प्रति जाटों ने भरोसा नहीं जताया। यहां भाजपा की लहर ऐसी चली कि पिछली बार तीसरे नंबर पर रहे अनूप वाल्मीकि ने रिकार्ड 70 हजार मतों से जीत हासिल कर ली। यहां रालोद की हालत इस कदर खराब हो गई  कि मौजूदा विधायक रहते भी बदले गए पार्टी प्रत्याशी की जमानत जब्त हो गई। हालांकि चुनाव के बाद यह माना जा रहा था कि इस सीट पर भाजपा और रालोद के बीच कांटे की टक्कर देखने काे मिलेगी लेकिन जनता जनार्दन ने इस सीट की तस्वीर ही बदल दी।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें