पाठकों के लिए यह जानकारी रोचक लगेगी कि कुल कृषि योग्य भूमि में सिर्फ 18.37 लोग ही खुदकाश्त थे अर्थात खुद खेती करते थे। खेतिहर भूमि का एक बड़ा हिस्सा (28 फीसदी) सिकमी अर्थात किराये पर था। 1868 तक प्रति हेक्टेयर किराया 3.56 रुपये से लेकर 3.85 रुपये तक था। 1888 में प्रति हेक्टेयर कृषि भूमि के किराए में भारी वृद्धि की गई थी। यह 10 रुपये प्रति हेक्टेयर सालाना तक पहुंच गई थी।
जमींदारी का जमाना
दो साल पहले से जमींदारी का जमाना चला आ रहा था। हुजूर (अलीगढ़) तहसील के पुराने कागजात बताते हैं कि तहसील 358 मौजों में बंटी हुई थी। इसे 973 महला में विभाजित किया गया था। तहसील में 256 एकल जमींदार थे। 354 जमींदारियां संयुक्त स्वामित्व के अधीन थीं। 136 पट्टीदारी और 106 भाईचारा के अधीन थीं। बरौली इलाके में बजगढ़ी की क्षत्रिय राजपूत रानी खुशहाल कुंवर और राव रघुराज सिंह की जमींदारी तीन महला और 22 गांवों तक फैली हुई थी। उत्तरी कोल क्षेत्र मोरथल और कई गांवों की जमींदारी मुसलमानों बरगुजरों के पास थी।
इनमें पहासू और तालिब नगर के नवाब शामिल थे। पिंडरवाल के सैयद जफर अली खान समेत पठानों , सैयदों की भी जमींदारियां हुआ करती थीं। कुल 37.06 फीसदी भूमि का मालिकाना हक राजपूतों के पास था। इसका बड़ा हिस्सा जादौन, चौहान और बरगुजर लोगों के पास था। जमींदारी का वैश्य बिरादरी के पास 11.53, ब्राह्मणों के पास 9.72, कायस्थों के पास 8.21 , जाटों के पास 5.63 और 3.67 फीसदी लोधों के पास हुआ करता था। समय के साथ विभिन्न्न बिरादरियों के मालिकाना हकों में काफी तब्दीली दर्ज की गई।
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स्रोत- अलीगढ़ का गजेटियर (1878-1909)