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अतीत का अलीगढ़: 1840 तक हुजूर तहसील के नाम से जाना जाता था अलीगढ़ को

Wed, 18 Oct 2023 01:47 AM IST
चमन शर्मा कुमार अतुल, अमर उजाला, अलीगढ़

सार

राज्य सरकार ने एक शासनादेश के जरिए प्रदेश के सभी जिलों के लिए नया जिला गजेटियर तैयार करने का आदेश दिया है। उसके लिए कमेटियों का गठन किया जा रहा है। अलीगढ़ का अंतिम गजेटियर 1909 में तैयार किया गया था। लगभग 400 पेजों की इस पुस्तक में लगभग 114 साल पुराने अलीगढ़ के भूगोल, नदियों, प्रशासनिक व्यवस्था, सिंचाई व ड्रेनेज सिस्टम, पुलिस व्यवस्था आदि के बारे में विस्तार से वर्णन है। इस संबंध में अतीत का अलीगढ़ नाम से एक समाचार श्रृंखला शुरू की जा रही है। उम्मीद है कि पुराने अलीगढ़ के बारे में जानकारी पाठकों को रुचिकर लगेगी। कृपया अपनी राय से हमें अवगत कराएं।
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अतीत का अलीगढ़ - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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लगभग डेढ़ सौ साल पुराना उपसंभाग अलीगढ़ कोल, बरौली और मोरथल से मिलकर बना था। उस वक्त अलीगढ़ तहसील 355.64 वर्ग मील या 227606 एकड़ में फैला हुआ था। 1840 तक अलीगढ़ को आम बोलचाल में हुजूर तहसील कहा जाता था। इसे बाद में कोल तहसील का नाम दिया गया, क्योंकि अलीगढ़ का ज्यादातर हिस्सा कोल परगना का था। 1909 में तैयार किए गए आखिरी गजेटियर की मानें तो अलीगढ़ में झीलों और जलस्रोतों की भरमार थी। जाहिर है कि ये झीलें और जलस्रोत वक्त की गर्दिश में खो गए।

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अलीगढ़ मूलतः एक खेतिहर इलाका था। 1870 के बंदोबस्त के बाद 1906-07 तक इसका  69 फीसदी यानि कि 157052 एकड़ सिंचित था। इसमें से भी 31.14 फीसदी जमीन पर दोहरी फसल हुआ करती थी। बारिश पर्याप्त नहीं थी। 42.75 फीसदी इलाका नहरों की सिंचाई पर निर्भर करता था। ये नहरें गंगा, गंग नहर और गंगा की छोटी-छोटी सहायक नदियों से निकाली गई थीं। रबी की फसल पर जोर ज्यादा था। गेहूं के अलावा चना और जौ रबी की मुख्य फसलों में शामिल थी। खरीफ की फसल के साथ कपास और अरहर भी ठीकठाक मात्रा में उगाई जाती थी। लेकिन समय के साथ कपास और अरहर की जगह ज्वार और बाजरा ने ले ली थी। ज्वार 24.91 और बाजरा 11.06 फीसदी रकबे में उगाया जाने लगा था।

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1868 में 3.85 पैसे था प्रति हेक्टेयर कृषि भूमि का किराया

पाठकों के लिए यह जानकारी रोचक लगेगी कि कुल कृषि योग्य भूमि में सिर्फ 18.37 लोग ही खुदकाश्त थे अर्थात खुद खेती करते थे। खेतिहर भूमि का एक बड़ा हिस्सा (28 फीसदी) सिकमी अर्थात किराये पर था। 1868 तक प्रति हेक्टेयर किराया 3.56 रुपये से लेकर 3.85 रुपये तक था। 1888 में प्रति हेक्टेयर कृषि भूमि के किराए में भारी वृद्धि की गई थी। यह 10 रुपये प्रति हेक्टेयर सालाना तक पहुंच गई थी।

जमींदारी का जमाना
दो साल पहले से जमींदारी का जमाना चला आ रहा था। हुजूर (अलीगढ़) तहसील के पुराने कागजात बताते हैं कि तहसील 358 मौजों में बंटी हुई थी। इसे 973 महला में विभाजित किया गया था। तहसील में 256 एकल जमींदार थे। 354 जमींदारियां संयुक्त स्वामित्व के अधीन थीं। 136 पट्टीदारी और 106 भाईचारा के अधीन थीं। बरौली इलाके में बजगढ़ी की क्षत्रिय राजपूत रानी खुशहाल कुंवर और  राव रघुराज सिंह की जमींदारी तीन महला और 22 गांवों तक फैली हुई थी। उत्तरी कोल क्षेत्र मोरथल और कई गांवों की जमींदारी मुसलमानों बरगुजरों के पास थी। 

इनमें पहासू और तालिब नगर के नवाब शामिल थे। पिंडरवाल के सैयद जफर अली खान समेत पठानों , सैयदों की भी जमींदारियां हुआ करती थीं। कुल 37.06 फीसदी भूमि का मालिकाना हक राजपूतों के पास था। इसका बड़ा हिस्सा जादौन, चौहान और बरगुजर लोगों के पास था। जमींदारी का वैश्य बिरादरी के पास 11.53, ब्राह्मणों के पास 9.72, कायस्थों के पास 8.21 , जाटों के पास 5.63 और 3.67 फीसदी लोधों के पास  हुआ करता था। समय के साथ विभिन्न्न बिरादरियों के मालिकाना हकों में काफी तब्दीली दर्ज की गई।
जारी...
स्रोत- अलीगढ़ का गजेटियर (1878-1909)
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