राजकीय औद्योगिक एवं कृषि प्रदर्शनी का कोहिनूर मंच विख्यात कवियों व कवयित्रियों से रोशन हो उठा। हास्य, ओज, शृंगार व वीर रस की रचनाओं के समंदर में श्रोता डूब रहे। हर रचना पर उन्होंने खूब वाहवाही लूटी।
प्रसिद्ध हास्य कवि अरुण जेमिनी ने मानवीय संवेदना को झंकृत करते हुए सुनाया ‘आंखों में पानी, दादी की कहानी, परोपकारी बंदे और अर्थी को कंधे’। कवि अभय निर्भीक अंबेडकरनगर ने ‘भारत माता का हरगिज सम्मान नहीं खोने देंगे, अपने पूज्य तिरंगे का अपमान नहीं होने देंगे’ पर खूब वाहवाही लूटी। प्रसिद्ध कवि डॉ. विष्णु सक्सेना ने सुनाया ‘रेत पर नाम लिखने से क्या फायदा, एक आई लहर कुछ बचेगा नहीं, तुमने पत्थर का दिल हमको कह तो दिया, पत्थरों पर लिखोगे कुछ मिटेगा नहीं’।
प्रयागराज से पधारे शैलेंद्र मधुर ने ब्रज की संस्कृति को पिरोते हुए सुनाया ‘सोचिए बांसुरी के सुरों पर जरा, चित्र राधा का मन में उभर आएगा, जब भी कान्हा की यादों में जाएंगे हम, मोर का पर हवा में उतर आएगा’।
कवि प्रियांश गजेंद्र ने पढ़ा ‘इतने निर्मोही कैसे सजन हो गए, किसकी बाहों में जाकर मगन हो गए, लौट करके न फिर आए परदेश से, आदमी न हुए कालाधन हो गए’। कवयित्री डॉ. अंजना सिंह सेंगर नोएडा ने कवि डॉ. गोपाल दास नीरज को समर्पित करते हुए सुनाया ‘किस दुनिया में बसे बताओ, निश्चय ही मैं आऊंगी, व्याकुल भारत की धरती है, तुमको यहां बसाऊंगी, मन के साज नहीं बजते हैं, अब पीड़ा अधिकाई है, हे कविवर, सब शोकाकुल हैं, याद तुम्हारी आई है’।
कवयित्री श्वेता सिंह ने सुनाया ‘हृदय जिसको समझता है कथा मैं उस अकथ की हूं, सदा से गामिनी मैं तो तुम्हारे प्रेम पथ की हूं, अरे कौन्तेय पहचानो सुभद्रा हूं तुम्हारी मैं, युगों से सारथी मैं ही तुम्हारे भाव रथ की हूं’। व्यंग्यकार व कवि सर्वेश अस्थाना ने सामाजिक ताने-बाने पर प्रहार करते हुए सुनाया ‘सामान्य चोर तो चुराता है, घर का सामान और पैसा अक्सर, पर चयनित चोर चुरा लेता है हमारी प्रगति और विकास के सभी अवसर’। ओज कवि विनीत चौहान अलवर की ‘बहुत दिनों के बाद देश में ऐसा मौसम आया है, अमर तिरंगा कश्मीर में खुल करके लहराया है’ रचना पर खूब तालियां बजीं। सरदार मंजीत सिंह, फरीदाबाद से सुनाया ‘ऑनर किलिंग से प्रेम कथा फेल हो गई, हत्यारों की तो अगले दिन ही बेल हो गई, अरबों का माल लूट के वो उड़ गए विदेश, कुछ मुर्गी चोरों को यहां पे जेल हो गई’। कवयित्री डॉ. रुचि चतुर्वेदी, आगरा ने पढ़ा ‘ ख्लाल महावर लगे मेरे इन पांव की चिंता मत करना, सीमा पर जागे रहना तुम गांव की चिंता मत करना, ठिठुरन हो या कड़ी धूप हो छांव की चिंता मत करना, लगे युद्ध में चोट अगर तो घाव की चिंता मत करना’। कवयित्री डॉ. कविता किरण ने पढ़ा ‘ गुजरो न बस करीब से ख्याल की तरह, आ जाओ जिंदगी में नए साल की तरह, कब तक किसी दरख्त से तने रहोगे तुम, झुक कर गले मिलो कभी तो डाल की तरह’। कवयित्री डॉ. कविता ‘किरण’ ने सुनाया ‘बात जब भी होती है अपनों की, मां से ज्यादा कोई करीब नहीं, आदमी वो बहुत ही अभागा है, मां की ममता जिसे नसीब नहीं’।
कवि प्रवीण राही मुरादाबाद ने सुनाया ‘यूं तो रिश्ते तमाम बेहतर हैं, हां मगर मां से कौन अच्छा है, आदमी कितना भी बड़ा हो जाए, मां की नजरों में फिर भी बच्चा है’। कवि राजेश बघेल ने सुनाया ‘ले कंधों पर जिम्मेदारी, हम फर्ज निभाने आ पहुंचे, घर छोड़ भेष परिवेश देश परदेश कमाने आ पहुंचे’। कवयित्री समीक्षा सिंह ने सुनाया ‘मैं वेदों का अमर ज्ञान, मैं वचनों की परिपाटी हूं, मैं युद्धों का अर्जित फल वीरों की हल्दीघाटी हूं’। कवि अशोक अंजुम ने सुनाया ‘ वक्त ने सवाल किए हम जवाब ले आए, दिन में जो भी देखे थे सारे ख्वाब ले आए’। कवि उपेंद्र पांडेय ने सुनाया ‘वतन के वास्ते ही तो वतन की लाज रखते हैं, शिराओं में यहां भर कर के हम फौलाद रखते हैं’।
इससे पूर्व सम्मेलन का शुभारंभ स्वामी पूर्णानंद गिरी, अरुण जेमिनी, डॉ. अंजना सिंह सेंगर, विनीत चौहान ने दीप प्रज्ज्वलन से किया। संचालन कार्यक्रम संयोजक डॉ. राकेश सक्सेना व सर्वेश अस्थाना ने किया। इस अवसर पर एडीएम सिटी डीपी पाल, सिटी मजिस्ट्रेट प्रदीप वर्मा आदि मौजूद रहे।