अलीगढ़। कोरोना काल में लॉकडाउन के वक्त सारी गतिविधियां ठप हो गई थीं और संक्रमण भी तेजी से फैल रहा था। लोग घरों में कैद हो गए थे। कई परिवारों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया था। उन दिनों विपरीत हालात का सामना पिसावा क्षेत्र के गांव डेटा कलां की नीलम भी कर रही थीं, पति का काम छूट गया था। इस संकट से निपटने के लिए उन्होंने साहसिक कदम उठाया और अपनी जमा-पूंजी लगाकर फिनायल व सैनिटाइजर बनाने का काम शुरू किया। कोरोना काल में जबरदस्त मांग होने के चलते यह काम चल निकला। उनकी देखा-देखी गांव की अन्य महिलाएं भी जुड़ने लगीं। उनके तीन समूहों में कुल 37 महिलाएं जुड़ी हुई हैं, जो प्रतिमाह खर्च निकालने के बाद 10 से 15 हजार रुपये की बचत कर रही हैं।
इंटरमीडिएट कर चुकीं नीलम ने नारी सशक्तीकरण की जो मिसाल पेश की है, वह अन्य महिलाओं के लिए सबक से कम नहीं हैं। हालांकि, उनका सफर आसान भी नहीं था। उन्होंने बताया कि सबसे पहले वह राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम) के तहत स्वयं सहायता समूह से जुड़ीं। फिर काम करने का तरीका समझा। उन्होंने बताया कि कोरोना काल से पहले गाजियाबाद में सैनिटाइजर व फिनायल बनाने का प्रशिक्षण लिया था।
ऐसे में समूह से 25 हजार रुपये का ऋण लिया और अपनी जमा-पूंजी मिलाकर फिनायल व सैनिटाइजर बनाने का काम शुरू किया, लेकिन कच्चे माल की समस्या खड़ी हो गई। अधिकारियों को समस्या बताई तो उन्होंने मदद की। इसके बाद कच्चा माल मिलना शुरू हुआ तो काम चल निकला। इसके बाद गांव की अन्य महिलाएं भी उनसे जुड़ने लगीं। उन्होंने बताया कि वर्तमान में तीन समूहों में कुल 37 महिलाएं जुड़ी हुई हैं। खर्च निकालने के बाद हर महिला सदस्य को प्रतिमाह 10 से 15 हजार रुपये की बचत हो रही है। नीलम कहती हैं कि गांव में रहकर स्वरोजगार से जीवन में खुशहाली लाई जा सकती है। संवाद
राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन बन रही मददगार
महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए वर्ष 2011 में राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम) योजना शुरू की गई थी। जिले में करीब 14 हजार से अधिक समूहों से जुड़कर करीब 1.40 लाख महिलाएं आत्मनिर्भर हो चुकी हैं। महिलाएं घर में झाडू, अचार, चटनी, मुुरब्बा, फिनायल, सैनिटाइजर बनाने का काम कर रही है। कई महिलाएं प्रेरणा कैंटीन भी चला रही हैं तो कोई राशन की दुकान संभाल रही है।
ये है स्थिति
- एक समूह में दस महिलाओं का होना अनिवार्य है। 18 साल से अधिक की युवती व महिलाएं समूह में शामिल हो सकती हैं।
- जिले में ग्राम पंचायत स्तर पर महिला समूह बनाए जाते हैं।
- 13428 समूहों से करीब 1,43,099 महिलाएं जुड़ी हुई हैं।
- एक समूह में हर महिला की औसतन छह हजार रुपये प्रतिमाह की आय होती है।
ब्लॉक वार स्वयं सहायता समूहों की स्थिति
ब्लॉक समूह महिलाएं
अतरौली 1414 15880
अकराबाद 998 10656
बिजौली 948 10596
चंडौस 804 8390
धनीपुर, 1245 13493
गंगीरी 851 9348
गौंडा 1156 12571
इगलास 880 9515
जवां 1403 15342
खैर 874 9740
लोधा 1329 14392
टप्पल 1224 13176
स्वरोजगार ने बदल दी जिंदगी
स्वयं सहायता समूह से जुड़कर स्वरोजगार का अवसर मिला है। समूह की महिलाओं को घर पर ही अचार, फिनायल आदि बनाने का काम मिल रहा है। बदले में अच्छी-खासी कमाई करने का मौका मिल रहा है। आय भी बढ़ रही है।
- ममता देवी, डेटा सैदपुर
घर की आर्थिक स्थिति बेहद खराब हो चुकी थी। एनआरएलएम समूह से जुड़कर घर में ही अचार, चटनी, जैम बनाकर हर महीने अच्छी आय हो रही है। इससे अब जिंदगी के मायने ही बदल चुके हैं।
- लक्ष्मी देवी, पिसावा
राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन योजना से करीब 1.45 लाख महिलाएं आत्मनिर्भर बन रही है। उन्हें घर बैठे स्वरोजगार मिल गया है, उनकी आय भी अच्छी हो रही है। इनसे प्रेरणा लेकर अन्य महिलाएं भी योजना से जुड़ रही हैं।
- अंकित खंडेलवाल, सीडीओ