गैस सिलिंडर न मिलने से घरेलू उपभोक्ताओं की मुश्किलें बढ़ गई हैं। हालात इतने खराब हैं कि कई घरों में पड़ोसियों से गैस सिलिंडर मांगकर खाना बनाया जा रहा है। गैस एजेंसियों पर दिनभर लोगों की भारी भीड़ उमड़ रही है।
अलीगढ़ जिले में गैस का संकट गहराने लगा है। गैस की कमी के चलते 14 मार्च को एएमयू के 20 हॉलों में लकड़ी के चूल्हे पर सहरी-इफ्तार के लिए चने, पकौड़े बने। कई रेस्टोरेंट ने अपने मेन्यू से डोसा हटा दिया है। परिषदीय विद्यालयों में भी लकड़ी के चूल्हे पर मिड-डे मील बनाने की तैयारी चल रही है।
यूनिवर्सिटी में 20 हॉल हैं। एक-एक हॉल में तीन-चार हॉस्टल हैं। इनमें करीब 18 हजार विद्यार्थी रह रहे हैं। डीएसडब्ल्यू प्रो. मोहम्मद अतहर अंसारी ने बताया कि सिलिंडर के अभाव में हॉलों में लकड़ी के चूल्हे पर भोजन बनाने के लिए कहा जा चुका है। उधर, परिषदीय विद्यालयों में लकड़ी के चूल्हे पर मिड-डे मील बनाने की तैयारी शुरू हो गई है। विद्यालयों के प्रभारी प्रधानाध्यापकों ने कहा कि अगर एक-दो दिन में गैस सिलिंडर उपलब्ध नहीं कराए गए तो मिड-डे मील पूरी तरह लकड़ी के चूल्हे पर ही बनाना पड़ेगा।
गैस एजेंसियों के ऑनलाइन पोर्टल में तकनीकी खराबी आने से जिले में रसोई गैस की बुकिंग पूरी तरह ठप हो गई है। इस संकट का सीधा असर अब शहर के जायके पर पड़ रहा है। अत्यधिक गैस खपत के कारण कई रेस्टोरेंट ने अपने मेन्यू से डोसा हटा दिया है। अलीगढ़ होटल एंड रेस्टोरेंट एसोसिएशन के महामंत्री विवेक बगई ने बताया कि डोसे के तवे पर गैस की खपत बहुत ज्यादा होती है, इसलिए फिलहाल इसे बनाना बंद कर दिया गया है।
गैस एजेंसियों पर दिन भर लगी रही भीड़
गैस सिलिंडर न मिलने से घरेलू उपभोक्ताओं की मुश्किलें बढ़ गई हैं। हालात इतने खराब हैं कि कई घरों में पड़ोसियों से गैस सिलिंडर मांगकर खाना बनाया जा रहा है। गैस एजेंसियों पर दिनभर लोगों की भारी भीड़ उमड़ रही है, लेकिन पोर्टल काम न करने से समाधान नहीं निकल पा रहा है।
रामघाट रोड स्थित इंडेन गैस गोदाम पर आईं मीनू ने बताया कि गैस नहीं होने के चलते चूल्हे पर खाना बनाना पड़ रहा है। मसूदाबाद चौराहा स्थित गैस एजेंसी पर खैर रोड से आईं हेमलता ने बताया कि पहले घर पर गैस खत्म हो गई है पड़ोसी से सिलिंडर लेकर खाना बना रहे हैं।
कचौड़ी वाले कोयले और लकड़ी की भट्ठी पर आए
अलीगढ़ में सुबह के समय कचौड़ी का नाश्ता बेहद लोकप्रिय है। कई दशक पहले यह कचौड़ी विक्रेता अपने यहां लकड़ी के गट्टे जलाया करते थे। वक्त के साथ इन्होंने सिलिंडर प्रयोग करना शुरू कर दिया। अब इन्होंने फिर से लकड़ी और कोयले की और रुख किया है।